जे जन चरणन के रस पागे। तीन लोक तिन्ह तृण सम लागे॥
छिन-छिन दरसन कौ मन लोभा। तिन कौं धूरि स्वर्ग की सोभा
पंकज - पाँव छटा अति भावै। हियरा टूक - टूक ह्वै जावै॥
लीला ललित सदा सुधि आवै। तिनकौं कछू न देखि सुहावै॥
जुगल मिलन की आसा धारैं। काहू ओर कभू न निहारैं॥
सोचि-सोचि काटैं दिन राती। दुखसौं फटत छिनैं-छिन छाती॥
ऐसेन कौ जो जूठन पावौं। तौ अपनौ सौभाग्य मनावौं॥
विषय - पंक में बूढ़त भोरी। करहु कृपा अब सहज किशोरी॥