॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
प्रेम की पीर — पद 174
रसिक-चित्त-स्थिति
क्यौं विलपत तू बैठि अकेली, कौन सुनै को जानैं।
जो परि जाय श्रवण हूं कबहूं, को साँची करि माने॥
मत जु सुनौं मत जानौं मानौं, मोहि विलपिबौ प्यारौ।
नहिं बस चलै न सूझै कोऊ, दुख में और सहारौ॥
वे जु हँसैं झूँठी करि मानैं, नाँव धरैं सब मोकौं।
पै का करौं समात नहीं हिय, रुकै न कैसैं रोकौं॥
जो चुप रहौं बढ़ै व्याकुलता, बरबस बैठि कराहौं।
मैं कब कहौं हँसौ मत कोऊ, साँची कहौं सराहौं॥
मोहि लगै हिय परम अकबकी, ऊँचे टेर बुलाऊँ।
जो सब हँसैं बुरौ कहूँ काकौं, सबकौ मन बहलाऊँ॥
सबनि विनोद मोद हिय मेरे, कछु-कछु धीरज होई।
भोरी हित कछु लेत काहु कौ, निजु दिन काटत रोई॥