॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 189

आत्म-निवेदन

मोहि टेरन की कछु बान परी री।
दानी बड़ी सुनी त्रिभुवन में, तासौं द्वार पै आइ अरी री।
टरिहौं नहीं न याचहुँ औरैं, अब तेरे द्वार डरी सो डरी री॥
अजरज हौं कब की जु पुकारत, भनक न अजहू कान परी री॥
तब हूं तौ मोरी बनि आई, हो भोरी यह कीति खरी री।
कहि हौ बिकल कबहुँ इक कोऊ, भोरी टेरत तलफ मरी री॥