मोहि टेरन की कछु बान परी री।
दानी बड़ी सुनी त्रिभुवन में, तासौं द्वार पै आइ अरी री।
टरिहौं नहीं न याचहुँ औरैं, अब तेरे द्वार डरी सो डरी री॥
अजरज हौं कब की जु पुकारत, भनक न अजहू कान परी री॥
तब हूं तौ मोरी बनि आई, हो भोरी यह कीति खरी री।
कहि हौ बिकल कबहुँ इक कोऊ, भोरी टेरत तलफ मरी री॥