प्यारी हो, मेरो हृदय अकुलाव।
जमुना तीर मूँद दृग अब कब, चरण कमल चित लावै॥
अरबराय दृग खोलि निहारत, आरत टेर सुनावे।
कबहुँ भाग सराहत अपनौ, रीझि-रीझि गुन गावै॥
कबहूँ समझि अभाग सहमि, दृग जल ढारत मुरझावै।
आयु सिरानी जात छिनहि छिन, धीरज नैंक न आवै॥
मन माने मन करत मनोरथ, हौंसन जनम गँवावै।
सहज कृपाल स्वामिनी भोरी, छिन इक दरसन पावै