॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 193

आत्म-निवेदन

प्यारी हो, मेरो हृदय अकुलाव।
जमुना तीर मूँद दृग अब कब, चरण कमल चित लावै॥
अरबराय दृग खोलि निहारत, आरत टेर सुनावे।
कबहुँ भाग सराहत अपनौ, रीझि-रीझि गुन गावै॥
कबहूँ समझि अभाग सहमि, दृग जल ढारत मुरझावै।
आयु सिरानी जात छिनहि छिन, धीरज नैंक न आवै॥
मन माने मन करत मनोरथ, हौंसन जनम गँवावै।
सहज कृपाल स्वामिनी भोरी, छिन इक दरसन पावै