कस त लाड़िली द्रवहु दया करि।
मेटहु विषम जगत की ज्वाला, सजल जलज से चरण हृदय धरि॥
सूझ परत न साधना कोऊ, चहुँ दिशि हेरत टेरत डरि-डरि।
भोरी मूर्छि परी तेहि भेटिय, लै उठाय उर लाय भुजा भरि॥
कस त लाड़िली द्रवहु दया करि।
मेटहु विषम जगत की ज्वाला, सजल जलज से चरण हृदय धरि॥
सूझ परत न साधना कोऊ, चहुँ दिशि हेरत टेरत डरि-डरि।
भोरी मूर्छि परी तेहि भेटिय, लै उठाय उर लाय भुजा भरि॥