॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 201

आत्म-निवेदन

कब हौं कुञ्ज गली चलि जैहौं॥
ले ले नाम पुकारत आरत, चहुँ दिसि चकित चितहों।
दरसन लोभ मगन हों इक टक, हेरत पल न लगहों॥
आवत परम कृपालु स्वामिनी, लोट पन्थ में जैहौं।
भोरी अधर अरुण रँग रञ्जित, मुसिकन दृगन बसैहौं॥