कब हौं कुञ्ज गली चलि जैहौं॥
ले ले नाम पुकारत आरत, चहुँ दिसि चकित चितहों।
दरसन लोभ मगन हों इक टक, हेरत पल न लगहों॥
आवत परम कृपालु स्वामिनी, लोट पन्थ में जैहौं।
भोरी अधर अरुण रँग रञ्जित, मुसिकन दृगन बसैहौं॥
कब हौं कुञ्ज गली चलि जैहौं॥
ले ले नाम पुकारत आरत, चहुँ दिसि चकित चितहों।
दरसन लोभ मगन हों इक टक, हेरत पल न लगहों॥
आवत परम कृपालु स्वामिनी, लोट पन्थ में जैहौं।
भोरी अधर अरुण रँग रञ्जित, मुसिकन दृगन बसैहौं॥