॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 202

आत्म-निवेदन

देखत-देखत दिन सब बीते।
तुम अटूट अनुराग की दाता, हम अजहूँ रीते के रीते॥
हृदय न प्रेम न नैम नाम कौ, साधन सकल तजे अबहीते।
बिनु पद पंकज भोरी स्वासिनि, कितहूँ ठौर न ठीक सुभोते॥