देखत-देखत दिन सब बीते।
तुम अटूट अनुराग की दाता, हम अजहूँ रीते के रीते॥
हृदय न प्रेम न नैम नाम कौ, साधन सकल तजे अबहीते।
बिनु पद पंकज भोरी स्वासिनि, कितहूँ ठौर न ठीक सुभोते॥
देखत-देखत दिन सब बीते।
तुम अटूट अनुराग की दाता, हम अजहूँ रीते के रीते॥
हृदय न प्रेम न नैम नाम कौ, साधन सकल तजे अबहीते।
बिनु पद पंकज भोरी स्वासिनि, कितहूँ ठौर न ठीक सुभोते॥