॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 221

आत्म-निवेदन

देखन दै नैक छटा नीकी।
चहुँ दिशि ललित भूमि हरियाली, ऊपर झुकी घटा नीकी॥
चपला कोटि दिव्य द्युति मूरति, ठाड़ी मंजु अटा नीकी।
पल में हठ अपनाइय भोरी, निगम की रीति हटा नीकी॥