विनय करत मेरी बनि आई।
येहू बड़े भाग्य जो प्यारी, याचक तोरि कहाई।
याचक सबहि जगत में जेते, सुर-नर-मुनि समुदाई॥
मोसौं बड़ौ न याचक कोऊ, का मुख कहौं बड़ाई।
जाकौं जाचत श्याम लाडिलौ, तीन लोक कौ साई॥
भूरि भाग्य सौं भरी लाडिलौ, हौं तोहि जाचन आई।
यह तो बात सब विधि मेरी, अति आछी बनि आई॥
और द्वार मन जाइ न छिन अब, यह वर माँगहुँ माई।
दीजै सहज कृपा करि भोरी, सुनि श्यामा मुसिकाई॥