॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 247

आत्म-निवेदन

झूठौ भयौ दृगन कौ नेम।
तब तौ नीर बहावन लागे, अति ही काचे प्रेम॥
दृग भरि कछु न देखन हू की, हठ तब कीन्ही होई।
अब पुनि विषयन ढूँढन लागे, निलज लाज सब खोई। !
मेरे ह्वै मोसौं बैर विसायौ, कुसमय धोखौ दीन्हौ।
का मुख कहौं अनीति कृपानिधि, जनम अकारथ कीन्हौ॥
जड़ कठोर ताहू पै चंचल, तिनहूँ दोष न भोरी।
तुम तौ कृपा कोर टुक हेरो, कोमल चित्त किशोरी॥