झूठौ भयौ दृगन कौ नेम।
तब तौ नीर बहावन लागे, अति ही काचे प्रेम॥
दृग भरि कछु न देखन हू की, हठ तब कीन्ही होई।
अब पुनि विषयन ढूँढन लागे, निलज लाज सब खोई। !
मेरे ह्वै मोसौं बैर विसायौ, कुसमय धोखौ दीन्हौ।
का मुख कहौं अनीति कृपानिधि, जनम अकारथ कीन्हौ॥
जड़ कठोर ताहू पै चंचल, तिनहूँ दोष न भोरी।
तुम तौ कृपा कोर टुक हेरो, कोमल चित्त किशोरी॥