॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 252

आत्म-निवेदन

इतनी बात कपा करि दीजे।
सब ही सुख अति खारौ लागै, विरह ताप तन छीजै॥
सोच-सोच दृग ढारत आँसू, नैंन नींद नहिं आवै।
हा राधे मेरौ और न कोऊ, टेर - टेर अकुलावै॥
नाम रटै चौंकै चहुँ हेरे, पुलकै सकल सरीरा।
मिलवे की अति लगै चटपटी, पल छिन परै न धीरा॥
हिय में पीर उठै अति गाढ़ी, छिन-छिन फाटै छाती।
ऐसी कृपा करो अलबेली, करुणा कोमल गाती॥