॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 23

श्री राधावल्लभ लाल

कोमल चित मन मोहन, कबहू मेरी सुरति करैहौ।
सहज कृपाल दयानिधि प्यारे, जब-तब अवसर पैहौ।
सहज द्रवन की बान सदा हौ, दिल दरदीले कहैहौ॥
आरत हरण दीन दुखिया की, बिनय सुनत चित लैहौ।
भोरी बलि-बलि जाइ चरण पै, सोयो भाग जगैहौ॥