॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
प्रेम की पीर — पद 24
श्री राधावल्लभ लाल
सुन्दर मोहन रसिक रसीले।
अखिल लोक चूड़ामणि प्यारे, कोटि कलानिधि बदन छबीले॥
ब्रह्मा विष्णु शंभु सनकादिक, महिसा रहे बिचार बिचारी।
हारे वेद पुराण शास्त्र सब, गुनगन गिनत न पावत पारी॥
परब्रह्म परमारथ प्यारे, मुरलीधर कृपाल रस दानी।
अधम उधारण रसिक शिरोमणि, प्यारी चरण सहज रति मानी॥
शीश किरीट श्रवन मनि कुंडल, पीताम्बर ओढ़ैं चटकीलौ।
नीलाम्बुद सुन्दर तन प्यारे, चंचल चितवन चारु हँसीलौ॥
भोरी भाल कु अंक मिटावौ, प्रणत पाल दिल के दरदीले।
नव-नव नेह प्रिया पद दोजे, चतुर मुकुट मणि रंग रंगीले॥