॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 278

आत्म-निवेदन

या जीवन की चरचा न चलये।
प्राणनाथ सौं पोच प्राण की, बात कौन विधि कहिये
असन-बसन-तन सोचि पोच सब, पानी माहि बहैये।
मिलन आस पर तन मन वारिय, बड़े भाग्य जो पैये॥
नातर बैठि-बैठि भरि साँसें, सोचत द्यौस बितैये।
सजल नयन तनु पुलक मग्न मन, नाम टेर रट लैये॥
गाढी पीर बढै उर अन्तर, मुख सौं कछू न कहिये।
टूक-टूक हिय कीजिय भोरी, औषध वैद्य न चहिये॥