उमड़ि-उमड़ि नयना जल बरसै।
भीजत जाइ रङ्ग में देही, हृदय प्रेम सरसै॥
तन मन विकल नाम रट लागै, निशि-दिन परै न जानी।
छिन-छिन गावत नाचत रोवत, बन-बन फिरौं दिवानी॥
झूमत नयन कछू नहिं सूझत, पुलकावली सरीरा।
ऐसे कबहुँ बसैहौ भोरी, रँग भरी यमुना तीरा॥
उमड़ि-उमड़ि नयना जल बरसै।
भीजत जाइ रङ्ग में देही, हृदय प्रेम सरसै॥
तन मन विकल नाम रट लागै, निशि-दिन परै न जानी।
छिन-छिन गावत नाचत रोवत, बन-बन फिरौं दिवानी॥
झूमत नयन कछू नहिं सूझत, पुलकावली सरीरा।
ऐसे कबहुँ बसैहौ भोरी, रँग भरी यमुना तीरा॥