॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 294

आत्म-निवेदन

श्री राधे तोहि कैसे कै जानौं।
कैसौ रूप कहा छबि सोभा, बैठ-बैठ अनुमानौं॥
कहा सुभाव माधुरी लीला, कोटि कलपना ठानौं।
ऐसौ भाग्य जागि है कबहूँ, देखि-देखि हिय आनौं
एहो करुणा धाम किशोरी, जो हिय की पहिचानौ।
तौ किन भोरी प्रगट करत अब, सहज कृपा कौ बानौ॥