कबहूँ मोहि उमगि अपनैहौ।
हित हरिवंश किशोर लाड़िले कब ढिग टेर बुलैहौ।
सजल पौंछि दृग बाँह पकरि कै मन्द-मन्द मुसिकैहौ॥
पूछत कुशल कृपाल लाड़िले हिय कौ शूल मिटैहौ।
रँग भरौ रूप दिखे हौ नित-नित अँखियन माहि समैहौ॥
दैहौ बास पांव पंकज में लोचन कोर चितैहौ।
भोरी हित अति दीन दुखी की कब बिनती चित लैहौ॥