॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 28

श्री राधावल्लभ लाल

कबहूँ मोहि उमगि अपनैहौ।
हित हरिवंश किशोर लाड़िले कब ढिग टेर बुलैहौ।
सजल पौंछि दृग बाँह पकरि कै मन्द-मन्द मुसिकैहौ॥
पूछत कुशल कृपाल लाड़िले हिय कौ शूल मिटैहौ।
रँग भरौ रूप दिखे हौ नित-नित अँखियन माहि समैहौ॥
दैहौ बास पांव पंकज में लोचन कोर चितैहौ।
भोरी हित अति दीन दुखी की कब बिनती चित लैहौ॥