॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 311

आत्म-निवेदन

सो छबि नयनन में न बसीरी।
त्रिभुवन मोहन श्यामसुन्दर दृग, जा छबि माहिं फसीरी॥
बरसत सहज माधुरी धारा, मृदु मुसिकान लसीरी।
अँग-अँग भूषन वसन मनोहर, कंचुकि कसिब कसीरी॥
भरि-भरि नैन न सो छवि देखी, जैसे चकोर शशीरी।
भोरी धृग-धृग जीवन ऐसौ, सब जग करत हँसीरी॥