सो छबि नयनन में न बसीरी।
त्रिभुवन मोहन श्यामसुन्दर दृग, जा छबि माहिं फसीरी॥
बरसत सहज माधुरी धारा, मृदु मुसिकान लसीरी।
अँग-अँग भूषन वसन मनोहर, कंचुकि कसिब कसीरी॥
भरि-भरि नैन न सो छवि देखी, जैसे चकोर शशीरी।
भोरी धृग-धृग जीवन ऐसौ, सब जग करत हँसीरी॥
सो छबि नयनन में न बसीरी।
त्रिभुवन मोहन श्यामसुन्दर दृग, जा छबि माहिं फसीरी॥
बरसत सहज माधुरी धारा, मृदु मुसिकान लसीरी।
अँग-अँग भूषन वसन मनोहर, कंचुकि कसिब कसीरी॥
भरि-भरि नैन न सो छवि देखी, जैसे चकोर शशीरी।
भोरी धृग-धृग जीवन ऐसौ, सब जग करत हँसीरी॥