पोच प्राण की गिनती कीनी।
वा पद कंज छटा पर वारौं, त्रिभुवन शोभा जितनी॥
दृग भरि कबहुँ माधुरी प्यावौ, आस पुजावौ इतनी।
स्वर्ग-मुक्ति-संपति-सिधि भोरी, तृन सम गिनत न तितनी॥
पोच प्राण की गिनती कीनी।
वा पद कंज छटा पर वारौं, त्रिभुवन शोभा जितनी॥
दृग भरि कबहुँ माधुरी प्यावौ, आस पुजावौ इतनी।
स्वर्ग-मुक्ति-संपति-सिधि भोरी, तृन सम गिनत न तितनी॥