कृपा सो केसे विसरि गई।
नित की बान हुती करुणा की, अब विपरोत भई॥
नहिं सहि जात टेर दुखियन की, मूरति कृपा मई।
हों अब टेरत कौन बेर की, अंगुरी कान दई॥
युग-युग वही चाल चलि आई, अब कछु नई भई।
भोरी बिरियाँ सहज कृपानिधि, कौन सी रीति ठई॥
कृपा सो केसे विसरि गई।
नित की बान हुती करुणा की, अब विपरोत भई॥
नहिं सहि जात टेर दुखियन की, मूरति कृपा मई।
हों अब टेरत कौन बेर की, अंगुरी कान दई॥
युग-युग वही चाल चलि आई, अब कछु नई भई।
भोरी बिरियाँ सहज कृपानिधि, कौन सी रीति ठई॥