॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 332

आत्म-निवेदन

कृपा सो केसे विसरि गई।
नित की बान हुती करुणा की, अब विपरोत भई॥
नहिं सहि जात टेर दुखियन की, मूरति कृपा मई।
हों अब टेरत कौन बेर की, अंगुरी कान दई॥
युग-युग वही चाल चलि आई, अब कछु नई भई।
भोरी बिरियाँ सहज कृपानिधि, कौन सी रीति ठई॥