॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 344

आत्म-निवेदन

सोई ब्रज भूमि बिराजत नोकी।
सो वृन्दावन सोई जमुना, सोई कुंज भाँवती जीकी॥
हा राधे तुम कौं बिन देखे, चहुँ चितवत अकुलावौं।
किहि विधि कहाँ पाईये सोचत, धीरज चित्त न लावों॥
तुम बिन सब जग सूनौ लागै, कछु देख्यौ न सुहावै।
श्री राधा कृपालु अलबेली, छिन-छिन टेर सुनावै॥
विलपत पुलकत अकुलत हेरत, नयनन नीर बहावै।
छिन-छिन मूर्छि परै अवनी पै, छिन संभ्रम उठि धावै॥
कौन भाग्य ऐसौ दिन ऐहै, विरहा देह जरावै।
भोरी टूटि-टूटि के हियरा, टूक-टूक ह्वै जावै॥