कपट नीर नैनन ढरकायौ।
कछुवै करत बन्यौ न किशोरी, नाहक जगत हँसायौ॥
पर तिय द्रव्य लोभ लोचन में, अब लौं रहत समायो।
प्रेम प्रवाह उमगि अलबेली, ताहि न धोइ बहायौ॥
उर में प्रीति नेंक नहिं आई, झूठौ स्वाँग बनायौ।
भोरी धृग धर्म ध्वज पापी, जननी जनक लजायौ॥
कपट नीर नैनन ढरकायौ।
कछुवै करत बन्यौ न किशोरी, नाहक जगत हँसायौ॥
पर तिय द्रव्य लोभ लोचन में, अब लौं रहत समायो।
प्रेम प्रवाह उमगि अलबेली, ताहि न धोइ बहायौ॥
उर में प्रीति नेंक नहिं आई, झूठौ स्वाँग बनायौ।
भोरी धृग धर्म ध्वज पापी, जननी जनक लजायौ॥