दरद देहु, फिर दवा किशोरी, पहले प्रेम, निबाह बहोरी। तजि सब बिकल बिपिन भटकावो, औचक बाँह गही फिर मोरी॥ पहलैं बिरह की ताप तपावौ, फिर मिलि देहु रंग में बोरी। पहिलै तौ हिय अति उमगावौ, फिर तहँ आप समाइ रहौरी॥ प्रथम टेरती भूमि गिरावौ, फ़िर उठाइवे धाइ झुकौरो। व्याकुल प्रथम नीर ढरवावौ, फिर दिखाउ मुसकान जु थोरी॥ मूँदे नयन ध्यान करवावौ, अचक मूँद दृग मन्द हँसौरी। पहिलै मन मेरौ करहु दिवानी, फिर लट बाँध रखो बरजोरी॥ ज्यों रीझौ सो मोपै करावौ, फिर हँसि रीझौ कृपालु किशोरी। पहिलै आरत बिनय कहावौ, उमगि सत्य फिर कीजिय भोरी॥