कठिन अभाग देखि कै अपनौं, हा-हा हौं पछितात।
कहा कहौं तुम बिनु करुणानिधि, देह न छाँड़ी जात॥
नहिं दृग मूँद ध्यान धरि बैठत, नहिं देखन अकुलात।
नहिं बन धाइ ढूँढ़िवे आवत, तलफि न प्राण पठात॥
वृथा दिवस बीतत करुणानिधि, व्यर्थ जात सब रात॥
लागत लाज हिये अति प्यारी, मुख नहिं आवत बात॥
हित हरिवंश प्रेम रस सागर, त्रिभुवन जस विख्यात।
भोरी सहज प्रीति की याचक, तुम्हें टेरि रहि जात॥