॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
प्रेम की पीर — पद 372
आत्म-निवेदन
पद पंकज मन मधुप बसत ना,
जगज्जाल तजि अलक फसत ना।
कोटिक यत्त हेरि हिय हारी,
नयन कोर हिय माहिं धसत ना।
इतनौ सोच रहत मन माहीं,
मुकुर सरस छबि हिय निकसत ना।
दृग जल बहत कबहूँ करुणानिधि,
पै तब चरण कमल परसत ना।
विलपत आयु बीतिहै जानी,
दृग सन्मुख तुम कबहुँ हंसत ना।
कैसे प्राण कोटि तजि डारौं,
सो छवि नयन छिनहु दरसत ना॥।
कृपा कोर तिहुँ लोक डुबोये,
मो चातक पै कछु बरसत ना।
झूठी प्रीति जनावत तुमकों,
लखि कृपालु क्यौं रीझि हँसत ना॥
काधौं करौं कहौ हँसि प्यारी,
हिय में प्रेम-भाव विकसत ना।
भोरी मिट अभाग कौन विधि,
जो तब विरह प्राण निकसत ना॥