ऐसी द्वार कब टेर लगवौं, उमगौं और ताहि उमगावौं। हौं तौ दीन छीन तन प्यारी, केहि विधि, बहुविध बात बनावौं। श्री हरिवंश कृपा मति पाऊँ, श्री गुरु-महिमा प्रगट दिखावौं॥ लै तब नाम साँस जब खैंचौं, निज तन शलभ समान जरावौं। बिल्व पात लौं सहज किशोरी, टेरत तीनहु लोक डुलावौं॥ खग मृग मूर्छि अवनि पर पटकौं, सरवर सोखि शैल दरकावौं। रवि ससि चकित पंथ विसरावैं, सरित सिधु तरुवर उमगावौं॥ देव अदेव सिद्ध नर किन्नर, सबके सब व्यवहार भुलाबो। कै देखौ भरि नयन किशोरी, कै तृण सम तिहुँ लोक जरावौं॥ बाढ़त नयन नीर झर लगै, प्रलय पयोधि उमगि उमड़ावौं। बिनु देखे छिन धीर धरौं नहिं, आप मिटौं सब विश्व मिटावौं॥ यह सब सम्भव सुनहु किशोरी, तेरी कृपा कोर जो पावौं। भोरी बल तब हिये कृपानिधि, हौं तौ बहुत कहत सकुचावौं॥