॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 395

आत्म-निवेदन

पतितन हित नित कीजिय राज।
अधम उधारण सहज कृपानिधि, सकल लोक सिरताज।
स्वारथ के सब मीत जगत में, अन्त न आवत काज॥
तुम बिन कौन राखिबे बारौ, पामर जन की लाज
नित की बान सहज करुणा कौ, कहाँ बिसारी आज॥
तुम बिन कौन काम के प्यारी, जीवन सम्पति साज।
भोरी ऐसेहि जुग-जुग राजहु, नवल निकुंज समाज॥