मृदु मुसकान देखिवौ भावै।
अरबरात दग चातक प्यासे, पल छिन धीर न आवे॥
मृदुल मनोहर मूरत सुन्दर, देखत मन ललचावै।
सब जग सूनौ लगत कृपानिधि, तुम बिन कछु न सुहावै॥
चुथा भानु ऊगत नभ चन्दा, वायु त्रिविध बहि आवे।
त्रिभुवन निबिड़ अँधेरौ तुम बिन, ताप अधिक अधिकावै॥
सोचत समझत बनत न कछुवे, तन-मन अति अकुलाव।
भोरी श्री हित द्वार याचकौ, ललक-ललक रहि जावै॥