कमल दल नैनन की आस।
कबहूँ उमगि बूझि हौ मेरे, मन की हौंस-हुलास॥
उमड़त कृपा सिधु परिपूरण, सब सुषमा की रास।
चितवन चपल हिलोरत चहुँदिसि,तापर भृकुटि विलास॥
दरदीले रिझवार दीन हित, अति उदारता वास।
सील संकोच सनेह सुभगता, लाज रूप रस हास॥
मधु मद भरे रँगीले प्यारे, कोमल कमल विकास।
भोरे चतुर लड़ैंते पैने, करत दीन भय नास॥
जाकी पद रज शिव-अज याचत,सो जिनकौ निज दास।
भोरी हित देखनकौं ललचत,छिन-छिन छवि की प्यास॥