॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 419

शरणागति

भाग्य होन खोटी को लेहै।
को नित लाड़ लड़ाय राखि है, नित मुँह माँगौ दैहै॥
को सब दोष मेटिहै पल में, हृदय प्रेम सरसंहै।
भुज दै अंस कुंज को चलि है, करुणा कोर चितैहै॥
को भव-ताप सहज हँसि हरिहै, रोवत आइ हँसैहै।
को दयाल महि परत विकल तनु, भुज गहि आइ उठैहै॥
को भव-भंवर बहुत करुणानिधि, कर गहि पार लगहै।
सुर मुनि दुर्लभ सहज सुगति दै, को नित सुबस वसैहै॥
सुनहु कृपालु किशोरी ऐसी, आसा कौन पुजैहै।
तुम बिन कौन कृपानिधि भोरी, बाँह पकरि अपनैहै