श्री राधा इक आस हमारी।
सबल सबै बल के बल गाजत, अबलनि कौ बल तैं सुकुमारी
समरथ तेर चले भव सागर, पोचन को तोहि सोच सदारी।
पर के उड़ चले व्याध विलोकत, बेपर की तू राखिबे हारी॥
भाग्यवान निज भाग्य सराहत, भाग्य हीन कौं आस तिहारी।
पुण्य करत सो शुभ फल पावत, पतितन कौं तू पावन प्यारी॥
सब विधि सौ अवलम्ब न जाकै, तू नित ताहि निबाहन हारी।
भोरी भाग्य हीन अति खोटी, सबल स्वामिनी सिर पर प्यारी॥