॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 429

शरणागति

या द्वारे सौं नातौ हमारौ।
खोटे पतित निबाहन कारन, प्रगट रावरौ द्वारौ।
कितहू ठौर न ठीक दयानिधि, इक अवलम्ब तिहारौ॥
साधन और कछू नहिं सूझत, दृग लागत अँधियारौ।
भोरी की अलबेली स्वासिनि, चरण शरण प्रतिपारौ॥