कौन रूप कौन रङ्ग कौन शोभा अङ्ग-अङ्ग,
माधुरी अपार ताहि रञ्चकौऊ जानैना।
लाड़िली कौ रूप लाल प्यारो नित्य देखैं ताहि,
बीते किते कल्प तऊ देख्यौ नेकु मानैंना॥
लाड़िले कौ रूप त्योंही लाड़िली न पावै थाह,
कुञ्ज की निकाई भूले दोऊ कोऊ छानैना॥
हित कौ स्वरूप जहाँ देखिये न पार कह,
देखैं भरि नैन सोतौ काहू कौं पिछानैना।
भोरी बलिहार मोपै कीजिये कृपा की कोर,
यही सोच नैन यहाँ आजु लौं हिरानेना॥