॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 452

कुंडलियाँ

रैन अँधेरी मेह झर पवन चलत झकझोर।
नौका टूटी राखियौ हित हरिवंश किशोर॥
हित हरिवंश किशोर बोझ पापन कौ भारी।
भवनिधि ओर न छोर परी अब तौ मँझधारी॥
भवनिधि ओर न छोर शरण करुणानिधि तेरी।
भोरी हित तट दूर मेह अरु रैंन अँधेरी॥