॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 460

कुंडलियाँ

कृपा की कोर टुक हेरों बधाई जन्म की प्यारे।
न अब जाचक से मंह फेरो बधाई जन्म की प्यारे॥
न माँगू राजपदवी को न चाहूं स्वर्ग मुक्ति को।
न जांचू द्रव्य बहुतेरौ बधाई जन्म की प्यारे॥
जरा दृग सामने आना जरा आँखों में मुसिकाना।
जरा हंसि अपना कहि टेरो बधाई जन्म की प्यारे॥
ये कहदो अब कि तुम मेरे ये कहदो हँस कि हम तेरे।
अभय कर शीष पर फेरौ बधाई जन्म की प्यारे॥
सदा का अब यह नाता है यही भोरी को भाता है।
न आवै इसमें झकझेरौ बधाई जन्म की प्यारे॥