॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 63

श्री प्रिया मुख-कमल

हँसि-हँसि मोहि किन घायल कीजै।
जोपै इतनी कृपा कृपानिधि, तौ यह मांगे दीजै।
छिन इक भरि-भरि लोचन प्यारी रूप माधुरी पीजै॥
पुनि निशिवासर विरह तापसौं, यह तनु पल-पल छीजै।
भोरी सहज कृपाल किशोरी, अब बिलम्ब नहिं कीजै॥