॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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प्रेम की पीर — पद 81

सुरतांत

नव छवि भोर निहारों, तन मन जीवन वारों।
तन मन जीवन वारों जब ही, आलस वस अँगरावौ॥
झुक-झुक परत परस्पर अंसन, मसंद-मंद मुसिकाबों।
लटकि-लटकि पग चलन मनोहर, देखि-देखि सन हारों।
कबहूं भाग जगावहु ऐसो, नव छवि भोर निहारों॥