श्री हित स्फुट वाणी — पद 13
मैं जु मोहन सुन्यौ वेणु गोपाल कौ।
व्योम मुनि यानि सुर नारि विथकित भई,
कहत नहि बनत कछु भेद यति ताल कौ।।
स्रवन कुंडल छुरित रूरत कुंतल ललित,
रुचिर कस्तूरि-चंदन-तिलक भाल कौ।
चंद गति मंद भई निरखि छबि काम गई,
देखि “हरिवंश हित ” वेष नन्दलाल कौ ।।13।।
अर्थ / व्याख्या
इस पद में श्रीहिताचार्य जी ने स्वयं का अनुभव व्यक्त करते हुए श्रीनन्दनन्दन जी का वेणु (वंशी) नाद प्रभाव व स्वरूप वर्णित किया है।
व्याख्या: श्रीहित हरिवंश जी कहते है — मैंने स्वयं जो मन का हरण कर लेने वाले श्री गोपाल जी के वेणु (वंशी) का नाद सुना है।इस परम् अदभुत नाद को सुनकर आकाश में विमानों पर चल रहे मुनि व देवताओं की स्त्रियाँ भी चकित हो थकी सी शिथिल हो गई।यह असम्भव है कि कोई उस नाद की यति (लय का विश्राम) व ताल( (संगीत के सँस्कृत गर्न्थो में ताल के प्रकार माने है– मार्ग और देशी, भरतमुनि के मत से मार्ग(60) और देशी(120) ताल है।))में भेद कर विवेचित कर सके।
श्री वेणु वादक गोपाल जी के कानों में कुण्डल जड़ित हुए शोभयनमान है,लुढ़कते हुए केश मनोरम अंग-चेष्टा प्रगट कर रहे है।रुचिकर सुन्दर कस्तूरि का तिलक उनकी ललाट पर सुशोभित है। जय जय श्री हित हरिवंश जी कहते है– श्री वेणुवादक नन्दलाल का यह रूप वेश देखने के बाद तो चन्द्रमा की गति धीमी पड़ हई अर्थात मन स्थिर हो गया व काम की छवि चली गयी अर्थात काम का आकर्षण समाप्त हो गया।।13।।