॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्री हित स्फुट वाणी — पद 14

आज तू ग्वाल,गोपाल सौ खेलि री।
छाँड़ि अति मान वन चपल चलि भामिनी,
तरु तमाल सौ अरुझ कनक की बेलि री।।
सुभट सुन्दर ललन ताप परबल दमन,
तूब ललना रसिक काम की केलि री।
वेणु कानन कुनित श्रवन सुंदरि सुनत,
मुक्ति सम सकल सुख पाइ पग पेलि री।।
विरह व्याकुल नाथ गान गुन युवति तव,
निरखि मुख काम कौ कदन अवहेलि री।
सुनत ” हरिवंश हित ” मिलत राधारवन,
कंठ भुज मेलि सुख-सिंधु में झेलि री ।।14।।

अर्थ / व्याख्या

इस पद में श्री हिताचार्य जी ,मानवती श्री राधा जी को मान छोड़ श्री ललन श्यामसुन्दर से मिलन को कह रही है।

व्याख्या: हे स्वामिनी! आप आज गोपकुमार श्री गोपाल जी के साथ क्रीड़ा करें।हे सुकमारी! इस अत्यधिक मान को त्यागकर चपलता के साथ वन की ओर प्रस्थान करें और वहां श्री श्यामसुन्दर तरु तमाल के साथ स्वयं स्वर्ण बेलि की तरह उलझ जाये।।

महायोद्धा सुन्दर ललन काम की सेना का प्रबल रूप से दमन करने वाले है और हे ललना! आप रसिकता लिये हुए काम- केलि हो।

श्री श्यामसुन्दर जी की वेणु व्रन्दाकानन में गुंजार कर रही है,हे सुन्दरी उसको सुनने के बाद तो मुक्ति के समान सुख को भी पैरों से ठोकर मार कर ,प्रियतम से मिलना चाहिए।।

हे युवति! विरह में व्याकुल स्वामी आपका ही गुण गान कर रहे है ,हे स्वामिनी उनके मुख को निहार कर विरह वेदना को दूर करो।

जय जय श्रीहित हरिवंश जी कहते है– यह सुनते ही श्री राधा जी अपने श्री प्रियतम श्यामसुन्दर से मिल गई और श्रीयुगल कंठ व भुजा इस प्रकार मिले की सुख का समुद्र उमड़ पड़ा हो।।14।।