॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित स्फुट वाणी — पद 15

व्रषभान नन्दिनी राजत है।
सुरत-रंग-रस भरी भामिनी,
सकल नारि सिर गाजत है।।
इत-उत चलत,परत दोऊ पग,
मद गयंद गति लाजत हैं।
अधर निरंग रंग गंडन पर,
कटक काम कौ साजत है।।
उर पर लटकि रही लट कारी,
कटिव किंकिनी बाजत हैं।
(जै श्री ) “हित हरिवंश ” पलटि प्रीतम पट,
जुवति जुगति सब छाजत हैं ।।15।।

अर्थ / व्याख्या

इस पद में श्रीहिताचार्य जी ने श्री स्वामिनी प्रिया जी की सुरत में डूबी हुई छवि का वर्णन करते हुए रस समुद्र का वर्णन किया है।

व्याख्या: श्री व्रषभान जी की लाड़िली पुत्री प्रेम रस में सराबोर है।सुरत के रंग में रस से भरी हुई यह भामिनी (उत्तम प्रेममयी सुन्दर नार) सभी स्त्रियों के ऊपर शोभायमान हो रही है।। इधर-उधर चलने में इनके दो कदम पटल पर ऐसे प्रतीत हो रहे है जैसे मन्द गति की चाल में मदमस्त गजेन्द्र को भी लज्जित कर रही हो।इनके अधर का रंग उड़ा हुआ है और कपोलो पर रंग चढ़ा हुआ है जिससे वह अपने श्रीप्रियतम के ह्रदय में कामदेव की सेना को सजा कर तैयार कर रही हो।।

उनके उर पर काले केशो की लट लटक रही है और कमर पर किंकिनी की झंकार बज रही है।जय जय श्रीहित हरिवंश जी कहते है–इस अवस्था मे ओढ़ना श्री प्रीतम जी के ओढ़ने से बदल गया है(अतः पीताम्बर ओढ़ रक्खा है)परन्तु इन श्री सुकमारी युवती पर तो कोई भी युक्ति को सभी शोभा देती है।।15।।