श्री हित स्फुट वाणी — पद 17
तरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धन धर लालहि।
कनक लता-सी क्योँ न विराजत अरुझी श्याम तमालहि।।
गौरी गान सु तान ताल गहि रिझवत क्यों न गुपालहि।
यह जोवन कंचन तन ग्वालिन सफल होत इहि कालहि।।
मेरे कहे बिलंब न करि सखि भूरि भाग अति भालहि।
(जै श्री )”हित हरिवंश” उचित हौ चाहत श्याम कंठ की मालहि।।17।।
अर्थ / व्याख्या
इस पद में श्रीहिताचार्य जी श्री राधा जी को श्री श्यामसुन्दर जी से मिल मान छोड़ने को कह रहे है।
व्याख्या: यद्यपि श्री लाल जी ने गोवर्द्धन पर्वत उठाया हो अर्थात संसार के कष्ट का निवारण करते हो परन्तु उनके ध्यान में सदा आप ही हो।आप स्वर्ण-लता के समान और श्री श्याम सुन्दर जी तमाल रूप में तो दोनों साथ उलझ कर एक साथ विराजमान हो जाओ।।
आप गौरी राग का सुमधुर तान व ताल का प्रयोग कर श्री गोपाल जी को क्यों नही रिझाती हो।हे गोपकुमारी ! आपका यह स्वर्णिम तन को धारण करना व यह जोवन रूप श्री श्यामसुन्दर जी से मिलते ही इसी समय मे सफल हो जायेगा।।
मेरे कथन अनुसार आप देरी न करे ,हे प्राणप्रिय सखी ! आपका उच्च ललाट विपुल भाग से युक्त है।जय जय श्री हित हरिवंश जी कहते है–मेरी चाहना तो केवल इतनी है कि आप श्री श्यामसुन्दर जी के गले की माला बन जाओ।।17।।