श्री हित स्फुट वाणी — पद 18
आरती मदन- गोपाल की कीजियै।
देव रिषि व्यास शुक दास कहत निज,
क्यों न बिनु कष्ट रस सिंधु कौ पीजियै।।
अगर करि धूप कुंकुम मलय रंजित,
नव वर्तिका घृत सौ पूरि राखों।।
कुसुम कृत माल नँदलाल के भाल पर,
तिलक करि प्रगट यस क्यों न भाखो।।
भोग प्रभु योग भरि थार धरि कृष्ण पै,
मुदित भुज दंड वर चँवर ढारौ।।
आचमन पान हित मिलित कर्पूर जल,
सुभग मुख वास, कुल ताप जारौ।।
शंख दुंदुभि पणव घन्ट कल वेणु रव,
झल्लरी सहित सुर सप्त नाचौ।।
मनुज तन पाइ यह दाय ब्रजराज भज,
सुखद हरिवंश प्रभु क्यों न यांचौ।।18।।
अर्थ / व्याख्या
इस पद में श्रीहिताचार्य जी ने श्री मदन गोपाल जी की आरती का वर्णन किया है व सेवा पद्दति पर भी प्रकाश डाला है और साथ ही श्रीकृष्ण जी से प्राप्त सुख को अविचल बनाने की क्रिया कही है।
व्याख्या: श्री मदन-गोपाल जी की आरती कीजिए क्योंकि श्री देवऋषि नारद जी,श्री वेदव्यासजी, श्रीशुकदेव जी आदि सभी भक्त अपनी निजता व विस्वास से इस बात को कहते है फिर बिना कष्ट को प्राप्त हुए रस समुद्र को क्यों नही पान करते हो।।
आरती की बत्तियां अगर की धूप और केशर एवं चन्दन से रंजित घृत में सनी हुई होनी चाहिए।। श्री नन्दलाल जी को फूलों की माला पहना कर उनके ललाट पर तिलक सजना चाहिए फिर उनका यशोगान क्यों नही चखते हो।।
इसके उपरान्त विविध पकवानों से भर कर थाल में श्री कृष्ण जी को भोग रखना चाहिए और फिर प्रसन्नता के साथ अपने हाथों से चवँर से हवा करनी चाहिए।।
इसके पश्चात कपूर मिला हुआ जल ले कर श्रीकृष्ण जी को आचमन पान कराना चाहिए और सुन्दर मुख शुद्धि के द्रव्य अर्पण कर अपने संस्कार जनित पापों को नष्ट करना चाहिये।।
शंख,दुंदभी,पणव, घन्ट,वेणु,झल्लरी आदि के द्वारा सप्त सुर को ताल पूर्वक बजाते हुए नाचते क्यो नही।।
मानव देह प्राप्त कर के यह दाव लगा कि कैसे श्री ब्रजराज जी का भजन होए ,जय जय श्रीहित हरिवंश जी कहते है–सुख प्रदान करने वाले श्रीकृष्ण जी से अविचल सुख की याचना क्यो नही करता है।।18।।