॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित स्फुट वाणी — पद 22

लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी।
मनसिज मन हरन-हास, साँवरो सुकुमार रासि,
नखसिख अंग-अंगनि उमंगि सौभग सींव नखी।।
रँगमगी सिर सुरँग पाग लटकि रही वाम भाग,
चंपकली कुटिल अलक बीच-बिच रखी।
आयत दृग अरुण लोल कुंडल मंडित कपोल,
अधर दसन दीपति की छवि क्यों हूँ न जात लखी।।
अभयद भुज दंड मूल पीन अंस सानुकूल,
कनक निकष लसि दुकूल दामिनी धरखी।
उर पर मंदार हार मुक्ता लर वर सुढार,
मत्त दुरद गति तियनि की देह दसा करखी।।
मुकुलित वय नव किसोर,वचन रचन चित के चोर,
मधु रितु पिक साव नूत मंजरी चखी।।
(जै श्री) नटवत “हरिवंश “गान, रागिनी कल्यान तान,
सप्त स्वरन कल,इते पर मुरलिका बरखी ।।22।।

अर्थ / व्याख्या

इस पद में श्री हिताचार्य जी ने श्री श्यामसुन्दर जी के अंग व स्वरूप का अदभुत वर्णन किया है।

व्याख्या: हे सखी! श्री लाल जी की रूप माधुरी को अपने नेत्रो से थोड़ा देख तो सही,श्री साँवरे जी तो सुकुमार की राशी है,उनकी हंसी तो कामदेव का भी मन हरले,उनके नख से शिखा तक की सुंदरता तो सुंदरता की सीमा का भी उल्लंघन कर रही है।।

रंग से परिपूर्ण सर पर लाल पगड़ी उनके वाम भाग (श्री प्रिया जी) की ओर झुक रही है,चंपा के फूल की कली उनके घुघराले बालो के बीच -बीच मे सजी हुई है,उनके बड़े – बड़े नेत्र अतिही अरुण व चंचल है,उनके कपोलो पर कुण्डल मण्डलीय शोभा दे रहे है और उनके होठ व दन्त कान्ति की शोभा पर नेत्र किसी भी प्रकार से एकाग्र नही हो पा रहे है।।

उनकी भुजाएं अभय प्रदान करती है ,वैसे ही पुष्ट कंधे है,उनके तन पर पीताम्बर वैसे ही शोभायमान है जैसे कसौटी पर स्वर्ण रेखाए और उस पीताम्बर की चमक में बिजली की चमक भी दब गई है।उनके वक्षस्थल पर मंदार पुष्पो का हार है साथही सुडौल मोतियों की माला है।उनकी मद मत्त गजराज जैसी चाल देखकर युवतियों को देह दशा का ध्यान नही रह गया है।।

उनकी खिल -खिलाती हुई नवकिशोर अवस्था है,उनकी वाणी चित्त को चुराने वाली है जैसे मानो बसन्त ऋतु में आम की नई मंजरी को चख कर कोयल का बच्चा बोल रहा हो।

जय जय श्रीहित हरिवंश जी कहते है– सुन्दरतम सप्त स्वरों का आश्रय लेकर वे ताने लेते हुए भाव प्रदर्शन पूर्वक कल्याण रागिनी का गान कर रहे है।इतने पर भी वे वंशी के द्वारा अमृत स्वरों की वर्षा कर रहे है।।22।।