श्री हित स्फुट वाणी — पद 25
द्वितीय दोहा
तनहि राख सत्संग मै,मनहि प्रेम रस भेव।
सुख चाहत हरिवंश हित ,श्री कृष्ण कल्पतरु सेव।।2।।
अर्थ / व्याख्या
व्याख्या: इस धरा पर या श्री धाम वृन्दावन में निवास करते हुए शरीर को सत्संग में लगाना चाहिये नाकी प्रपंच में, यह सभी आचार्य महानुभावो का प्रयास व् अनुभव रहा है कि भटके हुए जीव को रस सिन्धु के समीप लाने का सत्संग सरल उपाय है तथा मन शुद्ध करने के लिए ,प्रण के साथ मन में “सभी से प्रेम”का भाव होना चाहिए अर्थात सभी के अन्दर उस परमात्मा का अंश आत्मा विराजमान है,ऐसा विचार रखना चाहिए।व्यक्ति बुरा हो या अच्छा ,छोटा हो या बड़ा अंश तो परमात्मा का है,उसे मन से प्रणाम करना चाहिये।अपने से छोटे को भी आदर देने से कोई छोटा नही होता वरन मन में आनन्द प्रकाशित होता है। मन वस्तुतः शुद्ध होता है।
जब शरीर को सत्संग और मन को प्रेम मिलेगा तो निश्चय ही श्री हित हरिवंश जी द्वारा बताये निकुञ्ज मार्ग का सुख प्रशस्त होगा और अगर यह सुख की चाहत जीव को है तो श्री कृष्ण कल्पतरु के समान कृपा करने वाले है। (कल्पतरु वह व्रक्ष है जिसके नीचे खड़े हो कर जो मांगो वह तुरन्त प्राप्त होता है)
अतः हमे तन को सत्संग में और मन को प्रेम में डुबा कर ये अभ्यास करना चाहिए ।यह अभ्यास तो निकुञ्ज प्रवेश के लिए भी कृपा पात्र बना सकते है,ऐसा श्री जी की कृपा से अटल विस्वास है।