श्री हित स्फुट वाणी — पद 26
तृतीय दोहा
निकस कुञ्ज ठाड़े भये,भुजा परस्पर अंश।
श्री राधावल्लभ मुख कमल,निरख नैन हरिवंश।।3।।
अर्थ / व्याख्या
व्याख्या: श्री धरा पर या श्रीधाम वृन्दावन में रहते हुए ,अनन्य रसिको के बताये मार्ग (प्रथम व् द्वितीय पद) पर चलते हुए श्री राधावल्लभ लाल के मुख कमल के दर्शन नित्य इस प्रकार करे की घनी कुञ्जो के मध्य गलबहियाँ दीये अत्यंत मनोरम रूप में वह वन विहार कर रहे हो इस कार्य को सार्थक करने के लिए श्री हित हरिवंश जी की वाणी को नैन या कहे वाणी जी को चश्मे की तरह बना कर करने से सम्भव है।