श्री हित स्फुट वाणी — पद 2
भानु दसम्म, जनम्म निशापति,
मंगल-बुद्ध शिवस्थल लीके।
जो गुरु होंय धरम्म-भवन्न के,
तौ भृगुनन्द सुमंद नवीके।।
तीसरौ केतु समेत बिधु-ग्रस,
तौ हरिवंश मन क्रम फीके।
गोविन्द छाँड़ि भ्रमंत दसौ दिस,
तौ करि हैं कहा नवग्रह नीके।।2।।
अर्थ / व्याख्या
इस पद में श्रीहिताचार्य जी ने नवग्रह की कुण्डली में अच्छी स्थिती बताते हुए, उसे भी तुच्छ बताया है यदि श्री जी की कृपा नही है।
व्याख्या: सूर्य दशम में,जन्म में निशापति(चन्द्रमा),मंगल-बुद्ध शिवस्थल में हो।यदि गुरु (ब्रहस्पति) स्वयं धर्म के घर में हो तो भृगुनंद (शुक्र) व शनि नोवे में हो।।
तीसरे में केतु व यथा स्थल विधु-ग्रस (राहू) भी हो तो श्रीहितहरिवंश जी के मन मे यह सभी अच्छे से अच्छे स्थल पर भी तुच्छ है क्योंकि यदि श्री राधावल्लभ लाल जी को छोड़कर जीव दशो – दिशाओ में भटकता फिर रहा है तो फिर नवग्रह अच्छे हो कर भी क्या अच्छा कर सकते है।।2।।