॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित स्फुट वाणी — पद 7

तैं भाजन कृत जटित विमल,
चन्दन कृत इन्धन।
अमृत पूरि तिहि मध्य करत,
सर्षप-खल रिन्धन।।
अध्दुत धर पर करत कष्ट,
कंचन-हल वाहत।
बार करत पाँवार मन्द,
बोवन विष चाहत।।
(जै श्री ) हित हरिवंश विचारिकै,
मनुज-देह गुरु-चरण गहि।
सकहि तौ सब परपंच तजि,
कृष्ण-कृष्ण-गोविन्द कहि ।।7।।

अर्थ / व्याख्या

इस पद में श्रीहिताचार्य जी ने दो उदाहरण के साथ मनुष्य की इस दुर्लभ देह का दुरूपयोग स्पष्ट किया है तथा बताया है कि श्री गुरु के चरणों का आश्रय लेकर श्री जी का भजन करो।

व्याख्या: तू निर्मल रत्नों से जड़ें बर्तन को चन्दन की लकड़ी के ईंधन द्वारा कार्य करता है और उसमें पूरी तरह अमृत भरा है परन्तु बीच मे ही तू उसमे सरसो के तेल निकली खली को रौंद रहा है। इस अदभुत धरती पर कष्ट करके सोने का हल चलाता है और मूंगे की बाड़ लगाता है परन्तु उसमे मन्द बुद्धि विष बोना चाहता है। जय जय श्रीहित हरिवंश जी कहते है–मन मे विचार कर दुर्लभ मनुष्य के शरीर में गुरु मिले है उनके चरण पकड़ और हो सके तो सभी संसार के प्रपंचो को त्यागकर श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण श्रीगोविन्द कह।।7।।