॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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Cabinet Minister Narayan Rane व उनके मंत्रालय से आये अधिकारियों को महाराज जी ने क्या उपदेश दिया ।

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

शिरीष महर्षि मशी आप कैबिनेट मिनिस्टर हैं अभी वर्तमान में और आप उनके साथ के सहयोगी जो कुछ उत्तर प्रदेश मंत्रालय से हैं कुछ जो कैबिनेट में बैठे हैं और कुछ पुलिस विभाग के मंत्रालय हमारे जी आपके सुमुख से कुछ आशीर्वाद भागवत धर्म से युक्त देश रहा है अब धीरे-धीरे आधुनिकताएं ऐसी बढ़नी जा रही है जिससे हमारे आचरण हमारे धर्म के प्रतिकूल होते जा रहे हैं वास्तविक अध्यात्म से ही हम सुख और शांति का अनुभव कर सकते हैं दूसरों के सुख के लिए जो जीवन धरण करता है वही महात्मा है और स्वार्थ वासनाओं की पूर्ति में धोती कुर्ता में है और उसका दूसरों का हिट करना स्वभाव बन गया उससे हम समाज में शांति और सुख का विस्तार करें उत्तरी होगा जब यहां होगी खास बात है अगर हमारा हृदय शांत है कैसे होगा किसी पद को प्रकार किसी संपत्ति को प्रकार सम्मान प्राप्त करके मां शांत नहीं होता भाई और अशांति से युक्त होता है कहानी पद छठ ना जाए और कहानी विरोध भावना प्रकट हो जाए इसका मतलब शांति का कुछ और स्वरूप है तो भगवान श्री कृष्णा चंद्र का

रहे हैं की श्रद्धावन केंद्रीय परम ज्ञानी परम भगवान जी का हमें लगता है की यदि हम यह बात जान जाए की मेरे भगवान ही विविध रूपन में है और मुझे उनकी सेवा करने का सौभाग्य मिला है और जितना भी हमें समर्थ भगवान ने दी है जो धर्म विरुद्ध आचरण करेगा भागवत विरुद्ध आचरण करेगा शास्त्र विरुद्ध आचरण करेगा तो शास्त्री और राजकीय दोनों जगह कानून बने हुए हैं राजकीय विधान में भी कानून है और हमारे शास्त्रीय विधान में भी नरक आदि का प्रावधान है तो इसलिए हमारी समर्थ के अनुसार अधर्माचरण करने वाले शास्त्र विरुद्ध आचरण करने वाले भागवत विरुद्ध धर्म विरुद्ध आश्रम करने वाले को दंड मिलन और शास्त्रों धर्म के गोल चलने वाले को सहयोग मिलन निर्बलों की सहायता करना किसी भी प्रलोभन में आकर अपने धन धर्म का त्याग एन करना चाहे कोई कितना भी बड़ा पद या धन मिलने का प्रलोभन हो हम अपने धर्म का त्याग ना करें तो इससे हमारे हृदय में जो सुख आएगा वो समाज में विस्तारित होगा जो शांति आएगी वो हमारे समाज में बढ़ेगी जैसे एक किसी कोनी में बैठा

हुआ कोई भी भागवत प्राप्त महात्मा सुख शांति से इस्थित होकर जब संकल्प करता है सर्वे भवंतु सकिना सर्वे संत निरामया सर्वे भद्र पश्यंत मां कश्यप भाग भावे तो जैसे दीपक है उसका जितना प्रकाश है उतना अंधकार नष्ट होगा ऐसे उसे महात्मा का जितना प्रकाश है उतनी जीवन का अंधकार नष्ट होगा तो आपको भी जो पद मिला है बहुत से नगर गांव लाखों लोग आपके अधीन हो सकते हैं प्रेम सुख और शांति आज हम सही ना समझना के करण कुछ लोग अपने पड़ा का दुरुपयोग करने लगता हैं कल से कोई भी सुविधा धन दौलत पद मुझे नहीं बच्चा सकता तो हमारे जितना समय बच्चा है हम प्रभु का स्मरण करते हुए धरमपूर्वक चले कोई बहुत बड़ी सेवा है देखो चाहे कांत गुफा में रहे हो पर आकर समाज सेवा ही करके जाना होगा तो आपको तो प्रारंभ से ही समाज में रख दिया और भगवान ने योग्यता दे दी और आपके हाथ में अधिकार दे दिया आप लाखों लोगों को शुभ पहुंच सकते हैं आप लाखों लोगों को दुख से बचाने का उपाय कर सकते हैं तो हमारी प्रार्थना है जो भगवान ने आपको पद दिया है ईमानदारी से सत्य

को साक्षी रख कर आप उसे पद पर चलिए और भगवती स्मरण करते रहे तो यह जन्म भी आनंद और सम्मानपूर्वक काटा और हम भगवान के पास जाकर भी उनका प्यार दुलार प्राप्त करेंगे यह जगत का जितना भी स्वरूप है यह प्रतिपल एक रस नहीं र सकता ये परिवर्तनशील है आप देख रहे हैं एक समय आपकी बाल्यावस्था थी अनजाने में जान ही नहीं पे जवानी ए गई और जवानी पता ही नहीं चला और शरीर से ताकता और बुढ़ापा की तरफ तो आगे वाली बिक्री तो सोच ले उसे दशा का नाम है मृत्यु जिसे बाल्यावस्था यौवन अवस्था जरवस्था फिर मृत्यु अवस्था मृत्यु के बाद परिणाम यह हमारी खेती जो हम कर रहे हैं वह हमें भोगना अवश्य में कृतम कर्म शुभअशुभम जो पड़ा में बैठकर के खूब मनमानी आचरण करते हैं तो भगवान ने उन्हें उनके स्वीकृत के अनुसार सौभाग्य दिया की समाज रूपी नारायण की सेवा कर लो और अगर वो उससे चक गए तो फिर ये दुर्लभ डे और ये बहुत ही माननीय पद ये हमारे किस कम में आए इसलिए हमारी दैनिक भाव से प्रार्थना है आप सब जो जी पद में हो सत्यता और ईमानदारी से भागवत प्रसन्नता

के लिए करोगे तो है सांसारिक कार्य पर इससे आपको भागवत प्रसन्नता प्राप्त हो जाएगी भागवत प्रताप हो जाएगी अमरीश जी को पता नहीं था की मेरी रक्षा में सुदर्शन चक्र है जब दुर्वासा जी अपने तपस्या के अभिमान में आकर के उनकी परीक्षा के लिए गए और कृत्य प्रकट की मंत्र से मरण का प्रयोग किया तो सुदर्शन चक्र जी प्रकट हो गए जबकि एक वो महात्मा है जो लंगोटी बालकल की लगाकर केवल दुब का रस पिता है और एक वो राजा जिसकी बहुत सी रानियां और बहुत सा वैभव है पर वो भागवत सेवा परायण है खास बात अंबरीश जी जगत को भगवान की सेवा मानकर राजपथ पर बैठ तो सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा में है कल भी उसे परस्त नहीं कर सकता जी पर हरि का व्रत अस्त रहे मुझे चाहिए की मेरा जीवन यह तो लाभ में हो ही और मेरा मरण भी महोत्सव बन जाए जैसे हमें अभी कहानी विदेश जाना हो और मुझे कोई ना परिचय हो और तुरंत मुझे देश से निकाला जब कैसा लगेगा अगर मुझे पास दे दिया गया है और वहां व्यवस्था कर दी गई फिर देसी किया जाए तो फिर कैसा लगेगा दोनों बटन को देखो ऐसे ही यह

देश हमें कमाई के लिए मिला है क्या सब कर्म की कमाई करके भजन की कमाई करके हम भागवत धाम पर अपना अधिकार प्राप्त करें भगवान की नित्य सेवा में पहुंचे आजकल जो बहुत मानसिकता बिगड़ रही है बी विचार मदिरापान मांसखाना एन-किन प्रकारों किसी भी हिंसा के द्वारा धर्म आचरण के द्वारा सुख भोग करना और धन कामना बहुत गलत है परिणाम में इसका जो परिणाम आएगा वह आप संभल नहीं सकते कोई भी धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा भगवान नाम तुम्हें शुभ प्रधान करेगा और ये धर्म विहीन जो आचरण बाढ़ रहे हैं हमें लगता है आप जैसे पदाधिकारी जनगर मिलकर के इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालें तो हमारी नवयुवक यही हमारे भारत देश की आगे चलकर वो पी रही हैं जो हमारे देश को श्रावस्ती सुरक्षित रखेंगे चाहे वो सी में कहानी भी हो अगर हमारा स्वभाव ठीक हो गया आचरण ठीक हो गए तो सब ठीक हो जाएगा इसलिए हमारी प्रार्थना है नाम जाप कीजिए और सबको भागवत सेवा की भावना से सुख दीजिए आपको जो पद मिला है वो जीवन सार्थक हो जाएगा और हम चाहते भी हैं हृदय से की आपका स्वागत करें पर

एक तो भिक्षुक है और दूसरी बात यह है की जब कोई गरीब जान से आते हैं और देखते हैं की बड़े जनों को दुपट्टा मिला माला मिला और वह जब रो के हमसे का देते की महाराज जी मुझे क्यों नहीं तो मुझे लगता है एक स्थान तो ऐसा होना चाहिए जहां सबको बराबर प्यार मिलन चाहिए आपको तो सब जगह सम्मान मिलता है क्योंकि वो है आपका अधिकार लेकिन वो आदमी जो एक गरीब आदमी ए रहा है वो जब बाहर खड़ा लाइन में देखा है की ये लोग सब दुपट्टा और हमको 1 मिनट खड़े नहीं होना दे देखा और निकाल दे

तो इसलिए एक दिन नियम ले लिया था की हम किसी को कोई भी बाहरी स्वागत हृदय से हम आपका स्वागत करते हैं और हमारे वचन ही आपकी लिए यह जो आप आए हैं हमारी लाडली जो से कृपा से आए हैं श्री राधिका कृष हनुमान जी का दर्शन विभीषण जी गए हैं कर रहे हैं तब उन्होंने कहा प्रभु मैं समझ गया की आज मेरे श्री राम के मेरे ऊपर कृपा है जो तुम दारासाठी देना अब मुझे भाव भरोसा हनुमंत बीनू हरि कृपा मिले तो हृदय का प्यार हम आपको समर्पित करते हैं आप स्वस्थ रहकर और परम पवित्र बुद्धि के द्वारा हमारे देश की सेवा करें बाहरी स्वागत हम तो भिक्षुक है की आपको माला पहनाए या चुनरी डालें ऐसा पहले सोचा था हमारे मां में था की अगर हमारे देश के पदाधिकारी जान धर्म का राष्ट्र समझेंगे तो लाखों को वो सुव्यवस्थित रखेंगे पर जो उनकी बातें सनी तो मुझे भी लगा की इनका तो सब जगह सम्मान होगा लेकिन उसका तो उसके लिए हमको इस स्थल पे एक श्रेणी रखती पड़ेगी एक श्रेणी में जैसे हम आपसे हाथ जोड़कर बात करते हैं ऐसे उनसे भी बात करते हैं जैसे हम आपको कोई

माला चुनरी नहीं ऐसे उनको भी कोई माला चुने गए तो एक समाज भाव हो गया तो संत के दरबार में समाज भाव ही संता ही यही सबसे बड़ा भगवान का आशीर्वाद होता है जिससे किसी को दुख नहीं पहुंचेगी इसलिए हम प्रकट में आपको चुनरी और माला नहीं पहने ता है

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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