॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

जगन्नाथ जी के शृंगार सेवी से जगन्नाथ जी की महिमा पर क्या बोले महाराज जी ?

▶ YouTube

श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

गोपी यस राधा यस राधा नाम गोपी स्मरण जैसे नियम से भक्त करता है ना ऐसे प्रभु करते हैं स्वयं मब उनको लग रहा था कि श्री कृष्ण के सम्यक स्वरूप का ज्ञान गोपियों को नहीं है यह मना किया गया था कि कभी सरकार के सामने ऐसी चर्चा ब्रज प्रेम की ना हो जाए पर वो छुप के सुन लिएला लेकिन प्रेम इतना बलवान है कि ऐसे भगवान की दशा बदल दी भला जीव की दशा बदल जाए कौन से आश्चर्य की बात मराज श्री 36 प्रकार के सेवाय तो में और हजार सेवायत है जगन्नाथ पुरी में लेकिन ये बिल्कुल अद्वितीय है कारण हमारे यहां भी श्लोक है यतम जन्म कर्म भी नार के परमे पदे थवा राधिका रत निकुंज मंडली तत्र तत्र हद में विराज ताम इसलिए आगे की तो रास्ता मत रखना हट करके कि हमारी योग्यता नहीं है हमारी योग्यता है प्रभु हम आपके चरणों के पास रहेंगे बस हां आप साथ कहीं भी ले चलो जगन्नाथ जी के श्रृंगारी है हा बड़ी कृपा बड़ी क विराज जय हो पतित पावन जगन्नाथ स्वामी नन पथ गामी हम जिनकी दासत से युक्त है ना वो भी देखो जगन्नाथ जी का जो प्रेम वप प्रकट है ना वो

यहां उनकी जो परम पावन लीला हुई उसी लीला को सुनकर स्वयं लीला करने वाले की ऐसी प्रेम अवस्था हो गई यह जो जगन्नाथ जी का रूप देख रहे हैं यह कोट कंदर्प को मोहित करने वाले हैं पर यह प्रेम का ऐसा रूप है उन्हीं के लीला है वही करता है उस लीला के कोई दूसरे ठाकुर थोड़ी है वही बृजेंद्र नंदन है कोई दूसरे नहीं है वही द्वारिकाधीश है वही जगन्नाथ जी हैं वो यह लीला ऐसी ब्रज प्रेम की है जैसे महाप्रभु चैतन्य देव की प्रेम दशा में आता है ना ऐसे सब हाथ ऐसे हां वही मतलब कुर्म वत लिखा है जैसे भगवान का कुर्मा अवतार हुआ ना क छपा अवतार ऐसे अंग कुर्म वत मतलब वो सब एक में एकसे बड़ा अलौकिक रूप मतलब घबरा गए भक्त जन देख कर के कि ऐसे जगन्नाथ और महाप्रभु में अंतर थोड़ी है सेवक स्वामी का लीला वही केवल कर रहे हैं जो जगन्नाथ जी है साक्षात महाप्रभु चैतन्य देव जी वही है जो महाप्रभु चैतन्य देव जी वही जगन्नाथ जी सही गौर सही कृष्ण सही जगन्नाथ हा वही ये प्रेम वपु जगन्नाथ जी का है जो आप बगलिर देखते ना प्रेम बगलिर है प्रेम बप है और

जिसके प्रेम से वह ऐसी भाव की महा प्रेममय दशा वह हमारी लाड़ली जो है हा राधा राधा राधा ये जो आप कृपा प्रसाद देख रहे हैं ना ये हमारी लाडली ज का कृपा प्रसाद राधा यस लाल जू की जो श्रवण इद्री ना प्रभु की गोपी यस राधा यस राधा नाम गोपी स्मरण जैसे नियम से भक्त करता है ना ऐसे प्रभु करते हैं स्वयं मथुरा में ही अचानक उद्धव जी प्रवेश क्योंकि सखा है तो देखा गोपी गोपी और अशुभ प्रवाह कर रहे प्रभु ु सारा जगत कहता कृष्ण कृष्ण कृष्ण और यह कह रहे गोपी गोपी गोपी राधा

राधा उनका प्रभु आपके आंसू मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहे प्रभु आप मत रोइए आप क्यों रो रहे हैं क्योंकि ज्ञानी उद्धव है ना आत्म प्रकाश हो चुका है ब्रहस्पति जी के शिष्य हैं और श्री कृष्ण के नित्य सखा है मतलब जो उद्धव जी को सौभाग्य वहां प्राप्त है वह अलौकिक है उन्हीं की पोशाक प्रसादी उन्हीं की जूठन उन्हीं के साथ और इतना ज्ञान है कि भगवान मंत्रणा करते हैं भगवान उनसे मंत्रणा करते हैं उद्धव से तो उद्धव जी को लगा कि प्रभु का रोना ठीक नहीं क्योंकि जानते हैं प्रभु की महिमा सर्वांतर्यामी सर्वज्ञ सर्व सामर्थ्य शली करतु करतु अन्यथा करतु यह सब ज्ञान है उनको प्रभु ने कहा हम भी चाहते कि हम ना रोए पर गोपी जन रो र ना कृष्ण कृष्ण कह के तो उधव मेरे आंसू नहीं रुक रहे और मेरी जबान नहीं रुक रही मेरी जबान गोपी गोपी गोपी ऐसा कहक रो रही तो आपका रोना कैसे बंद होगा उनका रोना बंद करो आ जाओ ब्रज में है मथुरा और ब्रज में कितना अंतर है वृंदावन में जाओ तो बड़ी ठसक आए कि आज हमको भगवान के जनों को उपदेश करने का सौभाग्य मिला

उद्धव जी का और बड़ी ठसक में आत्मा क्या है जब उनको हम बता देंगे ना श्री कृष्ण वही आत्म स्वरूप है तुम रोना तुम्हारा ठीक नहीं है मतलब उनको लग रहा था कि श्री कृष्ण के सम्यक स्वरूप का ज्ञान गोपियों को नहीं है पर व नहीं जान रहे थे कि जो तुम ज्ञान ब्रस पथ से प्राप्त किए हो वह श्री कृष्ण के चरण रज से ही प्रकट हुआ है ब्रास पति को विज्ञान श्री कृष्ण चरण रज से और वही चरण हो यते सुजात चरणाम बरहम स्नेस भला इनको कौन सा ज्ञान ना होगा वेदांत का पूर्ण स्वरूप नखल गोपिका नंदन भवा नखल देहि ना मंतरा आत्मिक आप हम जानते हैं कि आप केवल यशोदा नंदन नहीं हो मुझे पता है आप अखिल अंतर में विराजमान आत्मा हो नखल गोपिका नंदन भवा नखल दे हिना मंत आत्म दे तो गोपी कोई ऐसा थोड़ी कि उसे ज्ञान नहीं है सरकार उद्धव को प्रेमी बनाने के लिए और जब गोपियों के समीप आए उनके अशु युक्त दर्शन उनकी रज में बैठे और उनके जब प्रेम की दशा देखी तो कहा ठ ठग लिया श्री कृष्ण ने मुझे आए थे खुद समझाने कि अभी गोपी जानती नहीं श्री कृष्ण कौन है और जब

गोपी जल के पास आए तो उल्टा हो गया उन्होंने कहा ठग लिया मुझे श्री कृष्ण ने अर्थात अपने ऐश्वर्य और वैभव का तो ज्ञान करा दिया प्रेम से पूरा छूता रखा इसलिए वो यह नहीं मांगा कि मुझे श्री कृष्ण का सानिध्य मिले उन्होंने यह मांगा कि मुझे कोई गुल्म लता औषधि बना दो और मैं यहां ब्रज में बन के रहूं और इन गोपियों की चरण धूल पड़े ना तो मुझे प्रेम प्राप्त हो जाए नहीं हां वंदे नंद ब्रज स्ती राम पाद रेण भक्षण सा बार-बार लौट रहे हैं और कह रहे आशा म हो मेरी आशा है मैं कोई लता बता यहां गुलमा औषधि बन जाऊ तो प्रभु का जो प्रेम है वह प्रभु को भी अधीन किए हुए है मतलब भगवान से बढ़कर सृष्टि में कोई नहीं अनंत ब्रह्मांड में कोई नहीं सभी रोम रोम में कोटि कोटि ब्रह्मांड वास करते ऐसे महामहिम हमारे भगवान लेकिन प्रेम इतना बलवान है कि ऐसे भगवान की दशा बदल दी भला जीव की दशा बदल जाए कौन से आश्चर्य की बात जो जगन्नाथ स्वामी हैं यह हमारे भगवान की प्रेम बप है प्रेम रूप प्रेम दशा की स्थिति देखो ना ऐसे हाथ और अशु पूरी यह मना किया

गया था कि कभी सरकार के सामने ऐसी चर्चा ब्रज प्रेम की ना हो जाए पर वो छुप के सुन लिएला सुभद्रा जी बलराम जी तीनों महान प्रेम एकदम वैसे आज भी उस ब्रज प्रेम जहां जिस भूमि में बैठे हो इस प्रेम की महिमा का वो स्वरूप है वो स्वरूप भगवान हमारे ही तो प्रीतम है कोई और थोड़ी जगन्नाथ हमारे ही प्रीतम है वो प्रेम वपन का स्वरूप है इस रज में जो प्रेम छुपा हुआ है बड़े कृपा पात्र है श्री जी के श्री राधिका कृपा बिन सबके मनन गम यह जो प्रेम है ये किशोरी ज से ही प्राप्त होता है क्योंकि किशोरी जू श्री कृष्ण के हृदय का अल्लाद प्रेम जब मूर्त हुआ तो सांद्रानंद घन प्रेम मूर्ति किशोरी वह किशोरी किशोरी जी कोई स्त्री कोई देवी शक्ति ऐसा नहीं श्री कृष्ण हृदय का प्रेम समुद्र जब रूप धारण किया तो राधा किशोरी हो गई इसीलिए कहीं भी किसी को भी अगर कृष्ण प्रेम प्राप्त होता है तो श्री जी से प्राप्त होता है लाडली जी से प्राप्त तो जब हम लाडली जू का यश गाते हैं तो लाल जू को जो सुख मिलता है वैसे भी इनका स्वभाव है प्रभु का निज

यस ते अधिक भक्तन यस पर प्यार अगर प्रभु को उनके प्रेमी जनों जैसे किसी महान उनके अनुरागी की चर्चा करो ना तो प्रभु एकदम जैसे भक्त नहीं एकाग्र पूर्वक भगवान की चर्चा ऐसे भगवान एकाग्रता पूर्वक भक्त चर्चा फिर श्री जी तो प्रेम बप्पू है सोचो तो भक्त में प्रेम आता है अंश मात्र से वो तो प्रेम प्रीति मूर्ति मती रस सिंधो श्री कृष्ण के हृदय का प्रेम रस सिंधु जो है वो मूर्तिमान हुआ वो लाडली जो है लाडली जी कोई और थ इसीलिए अधीन है जाके अधीन सदा सावरो तो भगवान का नाम प्रेमधन है ना और प्रियाज प्रेम रूप है इसीलिए प्रिया अधीन है इसीलिए जा के अधीन सदा ही सावरो या ब्रज को सिरताज हमारे माई श्यामा ज को जब कोई राधा राधा राधा बोलता है तो लाल जू अपने आप को उसके अधीन कर देते हैं प्रेमा विष्कुंभ अपने प्रेमी जनों को ये माया का वैभव झूठा नहीं देते हैं हां वो अगर है अगर किसी के पास जैसे है वो राग रहित है वो उसका महत्व नहीं रखता अगर महत्व आ जाए तो अभी जाना नहीं प्रेम रस जाना नहीं ब्रह्मा के भोग सब विषम लागत ताई नारायण

ब्रज चंद की लगन लगी है जाई तो लाड़ली जू की कृपा से ये जो जैसे ठाकुर जी अपना ये थोड़ी लाए ठाकुर जी भेजते हैं माला प्रसादी वस् ये भेजते हैं हां अपने पार्षद से तो भेजेंगे तो ये कय इनके कर कमल है ये जगन्नाथ जी के ही कर कमल है मान लो प्रसाद मिल यह रूप जो है गौड़ है मुख्य वही विराज चलो वहां चलो वृंदावन यह प्रसाद लो ये उनको देक आओ ये उनका साक्षात प्रेम बप्पू है कैसे तुहे बताए कि श्री जी के चरणों के आश्रय से जैसे गोस्वामी जी अनुभव करते हैं जा पर कृपा राम

की ई ता पर कृपा करे सबको ले ऐसे बस श्री जी के आश्रय से जितने भक्त हैं जितने महापुरुष हैं जितने भगवत स्वरूप विग्रह सेवा में विग्र अवतार भगवान को होता है सबका प्रसाद सबकी कृपा सबका दुलार के लाडली महाराज स्वामिनी है ना हमारी भी स्वामिनी हमारे लाल ज की भी स्वामिनी 36 प्रकार के सेवाय में और हजार सेवायत है जगन्नाथ पुरी में लेकिन यह बिल्कुल अद्वितीय है कारण जगन्नाथ पुरी में अभी इनका सात महीने पहले विवाह हुआ है जी सिर्फ और सिर्फ राधा नाम का हुआ पर यहां ब्रज से मतलब भक्त संत लोग गए थे और वहां इतना बड़ा आयोजन हुआ कि वहां के सभी सेवायत जो है वो आके बोलने लगे कि हम भी अब अपने बच्चों की शादी में इस प्रकार का राधा नाम कीर्तन ही कराएंगे और आपके सत्संग का ऐसा प्रभाव है इन पर कि जगन्नाथ पुरी में महाराज जी इनके सामने अगर राधा नाम कोई लेता है ना इनके आंखों से अश्रु आने लग जाते हैं तो हमने हमने अभी उनसे पीछे बोला कि इतना अगर हमारी लाडली ज से आप प्रेम करते हैं तो उनसे हम प्रार्थना करके बात करते हैं आप मतलब

जगन्नाथ पुरी में अगला जन्म ना लेक सेवायत के रूप में आप हमारी लाडली जो के जन्म नहीं होगा हा कह रहे नहीं सुनो नहीं नहीं जन्म नहीं होगा बात मान लो हमारी ना तुम्हारा यह पपू है जो लाडली जी की सेवा में पपू होता वो पपू प्रदान करके वो सदैव सदैव के लिए अपने पास रख लेंगे जन्म काहे को देंगे और जगन्नाथ जी भी वही पारस में मिलेंगे क अलग थोड़ी है लाडली जू एक पलक झपक के लिए भी लाल जू से अलग नहीं रहती और लाल जू एक पलक झपक के लिए लाडली जू से अलग नहीं रहते हां लाडली जू की प्री सखी से लाल जू कहते हैं कहा कहो इन नैनन की बात सखी मैं अपने नेत्रों की बात क्या कहूं ये अलि प्रिया बदन अंबुज रस अटके अनत न जात ये मेरे नेत्र रूपी भोरे प्रिया रूपी मुख कमल पे सदैव मर रात ये अनत न जात कहा कहो नन जब जब रुक पलक संपुट लट अति आतु रकला अगर कहीं पलक झपक जाए प्यारी ज के दर्शन में एक सेकंड में पलक ऐसे होती है ना 700 कल्प के दुख का वियोग जो है प्रभु को एक पलक झपक में ऐसे महा प्रेमी प्रभु तो प्रिया जू से एक क्षण के लिए कभी भी

लग नहीं और प्रिया जू कभी एक क्षण से एक क्षण ये जो निज धाम में विराजमान जोरी है ये कभी भी लग नहीं होती है और आप हमारे प्रियालाल के ही पार्षद हैं पार्षद है अभी उन्हीं की सेवा कर रहे हो अगर आप श्री कृष्ण की सेवा कर रहे हो तो आप देखो आधे अंग में लाडली जो विराजमान मिलेंगे अगर आप श्री जी की सेवा कर रहे हो तो लाल जी आध क्योंकि दो नहीं है जगन्नाथ जी तो इतने से साधा इतने से राधा और कृष्ण का मिलन मूर्ति जगन्नाथ जी है हा वही तो कह रहा आप गौर से देख लो तो आप

ऐसा नहीं कि प्रिया सेवा में नहीं हो आप नहीं की बस अगला जन्म हो ऐसी आकांक्षा मत रखना क्योंकि अगर रखोगे तो हो जाएगा पक्का समझना नहीं नहीं नहीं इसमें जैसे हम छूट देते हमारे यहां भी श्लोक है यत्र मम जन्म कर्म भी नार के परमे पदे थवा राधिका रति निकुंज मंडली तत्र तत्र हृदय में विराजम मेरे हृदय में श्री किशोरी किशोर जो विराजमान चा नरक भेज देना मुझे कोई परवाह नहीं पर ये आचार्य बोल रहे हैं कलिकाल आगे इतना बढ़ेगा कि हमें ऐसा वातावरण नहीं मिलेगा हमें ऐसी अनुकूलता कहीं नहीं मिलेगी धीरे-धीरे धीरे-धीरे हम महापुरुषों से रहित होते चले जा रहे हैं जो भजनानंद महापुरुष जिनके संग से यह रंग आता है वह अंतर ध्यान होते चले जा रहे हैं और आजकल जो तपस्या भजन है वो मोबाइल की है स्मार्टफोन या छाती में पहले जैसे छाती में अपने गुरु जी की छवि ऐसे रखते थे और महापुरुषों की या प्रिया प्रीतम की अब आप देखो थोड़ी-थोड़ी देर में जैसे छवि देखते थे ऐसे मोबाइल किसका मैसेज आया कि कहां मन लगेगा बहिर मुख किए ना अभ अंतर्मुखी प्रीतम

का जस गा के रोते थे रसिक जन अब एकांत हुआ तो गेम खेलते हैं नाना प्रकार के उसमें सांसारिक दृश्य भैया अगला जो जन्म होगा भजन लायक परमाणु नहीं मिलेंगे इसलिए हम तो यही कहते हैं कि श्री जी यह नहीं वो तो समर्थ बोल गए कि तुम्हारी जहां इच्छा हो वहां करना लेकिन हम समर्थ नहीं है नहीं जैसे सयाना लड़का हो जाए ना तो घर के बाहर देश विदेश कहीं घूम आवे उसको सब पता है लेकिन अगर भोला लड़का है ना तो मां जाने नहीं देती हमको ऐसे ही कुछ बनना है एकदम भोले एकदम ऐसे कि श्री जी अपने महल से जाने ही ना दे ए तू महल के बाहर मत निकल यही रहे तू इतना बुद्धिमान नहीं कि अपने बचा को बचा के आ जाएगा फंस जाएगा कहीं बस हम ये चाहते कि हमें हमारे प्रीतम प्यारी जू की समीप प्राप्त हो बस वो महापुरुष जिन्होंने ऐसे गाए वह सदैव श्री जी में तन्मय है अब वो क नरक में रख दो तो क्या फर्क पड़ना है लेकिन हमारी हमें फर्क पड़ जाएगा नहीं पड़ जाएगा अभी कुसंग और कु दृश्य देखो अभी भावना बदल जाएगी सत्संग और सद्भावना यह जो बढ़ रही है यह हर समय नहीं

रहेगी तीन गुण है माया के सतोगुण रजोगुण तमोगुण बदलते रहते हैं जैसे जैसे कलिकाल बढ़ेगा वैसे-वैसे सहयोग बंद होता जाएगा परमार्थ का अभी अवसर निकल चलो श्री जी से यह है कि आप इस भूल भुलैया में मत फेंकना हम इतने विज्ञान ज्ञानानंद घन नहीं है कि भूल भुलैया से निकल के आपके पास आ जाएंगे प्रभु बस क्योंकि आगे बहुत भया अब जैसे और भयावह है अभी तो देखो 5000 वर्ष य तो हुए भवा कितना है कलिकाल है एकदम बढ़ा एकदम मिटा यही खेल उनका चलता ता रहता है हां वो घड़ा भरते हैं फिर खाली कर देते फिर भरते फिर खाली कर दे यही खेल चलता रहता है सृष्टि का सृजन पालन लय भैया हम इस खेल से थपेड़ों से उप गए हैं हमको प्रिया प्रीतम चाहिए उनके समीप चाहिए उनकी मुस्कान उनको देख देख देख के जीना चाहिए अब हमको ऐसे संसार में मत भेजो जहां छल है कपट है स्वार्थ है कहीं भी कोई किसी से अगर प्यार का नाटक करता है तो अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए उसके हृदय की बात कभी नहीं देखता वो तो केवल प्रभु जानते हैं वह केवल प्रभु ही है स्वार्थ रहित जग में अगर

कोई उपकार करने वाला है तो तुम तुम्हार सेवक असुरारी स्वार्थ रहित जग जुग उपकारी तुम तुम्हार सेवक असुरारी भगवान या भगवान के प्रेमी महा भागवत दो से ही मंगल होता है अब प्रेमी महा भागव तों का घाटा हो रहा है नहीं हो रहा प्रेमी महा भागवत जो रात दिन भजन में प्रभु में घाटा हो रहा है बड़े-बड़े जो महापुरुष पीछे देखें अत अब नया जो समय आ रहा है स्कूल में ही वैसे भ्रष्ट चरणों से युक्त हो जाते हैं महात्मा बनना जितेंद्रीय होना अखंड ब्रह्मचारी यह सब केवल लिखा पढ़ी

की बातें रह जाएंगी आचरण में नहीं आएगा इसलिए अभी कुछ अवसर है क्योंकि बच्चा है कलयुग ना 432000 में 5000 चल रहा है तो बच्चा है ना अभी निकल चलो अभी वह जवान नहीं हुआ है और जिस दिन वह अपने स्वरूप में आएगा तो भ्रष्ट अचारा सब संसारा धर्म सुने नहीं काना कलिकाल बिहाल के मनुजा नहीं माने को अनुजा तनुजा बहन बेटियों के प्रति दुर्भावना आ जाएगी नहीं माने को अनुजा तन कुछ कुछ तो छुटपुट सुनते हो जगत में जो लिखा है व अक्षर सा सत्य है तो अभी आगे ऐसा समझ नहीं आएगा कि हम साधना करके भगवत प्राप्ति कर सके आहार शुद्ध नहीं घी कितनी शुद्ध वस्तु है चर्बी मिला दी जाती है दूध कितना पावन वस्तु है कितने गंदे केमिकल से दूध बना केर रख देते हैं खोया बना क्या आप कहां पाओगे सब्जी में इंजेशन लगता है शाम के छोटी मो इतनी बड़ी घी और सुबह इतनी बड़ी ताजी हरी और अब खाओ तो केमिकल जो है वो तुम्हारे आंतों में जाकर कोई ना कोई रोग पैदा करेगा बोले हम तो शुद्ध शाकाहारी सब्जी खा रहे दूध पी रहे और दूध 5 लीटर दूध और ऐसी सामग मिलाकर 500 लीटर

बना सकते हैं वो अब वो दूध खरीद क्योंकि फ्लेट में गाय पालगे कहां फ्लेट में रते तो गाय कैसे पालो उसके लिए तो चारा चाहिए खुला क्षेत्र चाहिए तो दूध खरीदोगे आज आज पहले जब दूध बेचते थे ना गांव में तो उसकी निंदा करते थे गाय मा एक बराबर होती है या दूध पैसा से देते हो जिंदगी में जैसे अपने कभी दूध नापा नहीं गया पैसे नहीं तुम्हे जरूरत ले जाओ हम आज नहीं रखेंगे आप ले जाओ दूध मठा दूध आद फिरी गांव में ऐसा मिलता था यह ब्रज जो है प्रसिद्ध था बहुत समय आ रहा है ऐसा

अब आप अगर य सोचो कि अगला जन्म हो और भजन करें तो जगन्नाथ जी कृपा करें तो ऐसे समुदाय में पहुंचा दे कि जहां प्रेमी जन हो नहीं तो प्रेमी मिलना बहुत कठिन है एक बार भगवान वल्लभाचार्य जी से आचार्य चरण जी से उनके एक धनी मानी शिष्य आए और उन्होंने कहा कि हम 100 ब्रा को पवा चाहते हैं उन्होंने कहा एक वैष्णव को पवा दो 100 ब्राह्मणों के पवान का हल में बड़ा उत्साह बड़ा तो क भगवान स वैष्णव को पवा देते हैं तो का एक प्रेमी को पवा दो तो 100 वैष्णव जो है उनका बोले भगवान 100 प्रेमियों को पवा देते हैं तो उका प्रेमी 100 ले होते प्रेमी 100 दो ले होते भ तो हो सकते हैं हां प्रेमी जो अनुराग रंग में रंगे वो तो अंगुलियों में गिले जाते को एक पाव वो जो प्रेम लक्षणा भक्ति जो अनुराग मेरे श्री कृष्ण बात करते ही आंखों में आंसू आ गए हृदय में कुछ होने लगा रोमान छोरा मेरे प्रिया प्रीतम मेरे प्रभु ऐसे तो बरले जल होते हैं ये आगे चलकर प्रेमी मिलना हां विषय प्रेमी मिल जाएंगे विषन में डूबे हुए लेकिन भगवत प्रेमी प्रियालाल से

प्रेम महाप्रभु चैतन्य दे जब बोलते हरि बोल कृष्ण तो वायुमंडल कृष्ण में हो जाता जड़ चैतन्य द्रवित हो जाता है भदान की मूर्तिमान हा तो अब जो धीरे धीरे समय देखो जहां संत महापुरुषों का वो भजन वहां अपने लोगों का क्या भजन आगे क्या भजन करेंगे इसलिए आगे की तो रास्ता मत रखना हट करके कि हमारी योग्यता नहीं है हमारी योग्यता प्रभु हम आपके चरणों के पास रहेंगे बस हां आप साथ कहीं भी ले चलो समझ रहे ना आप ले चलो आप जहां पर आप हमारी इतनी जैसे बड़े-बड़े प्रेमियों ने मांगा भरत जी ने कहा अर्थ न धर्म न काम रुचि गति न चाहो निर्वान जन्म जन्म रति राम पद यहव मैं मोक्ष नहीं चाह धर्म अर्थ की तो बात किया धर्म अर्थ काम की तो मुझे मोक्ष नहीं बारबार जन्म दो लेकिन उस जन्म में मैं आपके अनुराग में डूबा रहा हूं प्रेम में डू बार हो संतो ने इसलिए छूट दी भगवान को कि अगर आप मुझे जनमाना ही चाहते हो तो जन्म पर अपने साथ आप हमारे राधिका त निकुंज मंडली तत्र तत्र हद में विराज हे प्रिया जो अपनी सखियों के साथ यहां खेलो ले चलो जहां चहे

ले चलना है यह बात है वो स्थिति वो भाव तो जैसे हम सोचे कि हमारा यह जन्म अधूरा रह जाए फिर अगले जन्म में पूरा कर लेंगे ऐसी गलती सोचो ही मति बस जैसे हैं आपके हैं इसी जन्म में मुझे आपको प्राप्त करना है अब आप आप देखो मेरे से क्या करवाते हो जिससे आप मिल जाओ जिसमें आपकी खुशी हो मेरे से करवा लो प्रभु मेरे में सामर्थ्य नहीं

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

संबंधित