॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #725 · 11 नवंबर 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

गौरव तनवर जी गुरुदेव जीवन को खुशहाल कैसे बनाया जा सकता हा बच्चा मनुष्य जीवन तो खुशी में ही डूबने के लिए मिला है पर जब तक हम शास्त्र विरुद्ध आचरण करेंगे तब तक भय चिंता शोक विषद उदगता यह बनी रहेगी आप अंदर देखो गलती करोगे ना चाहे जितना गुप्त करो वह गलती रे ऊपर सवार हो जाएगी तुम्हें भ भीत करेगी तुम्हें चिंता में डालेगी तुम्हें शोक में समस्या में डाल देगी खुशहाल जीवन गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं तब लगी कुशल न जीव कह सपनेहु मन विश्राम जब लगी भज नराम

कहू शोक धाम तज काम जब तक जीव काम आदि गंदी चेष्टा एं इनको छोड़कर भगवान का नाम जप नहीं करता तब तक उस स्वप्न में भी कभी शांति और विश्राम नहीं प्राप्त कर सकता हमारे य हीत ध्र दस जी बड़े महापुरुष हुए वो कह रहे जो चाहत है नित्य सुख वही खुशाल रहना नित्य सुख अरु मन को विश्राम हित ध्रु हित सो भजते रहो पल पल श्यामा श्याम यदि नित्य सुख चाहते हो खुशाल होना चाहते हो तो एक एक क्षण श्यामा श्याम श्यामा श्याम राधा राधा राधा परम खुशहाल हो जाओगे कैसी भी विपत्ति हो आप खुशहाल रहोगे जैसे भारी कष्ट का संयोग है किडनी फेल खुशहाल है हम दुखी नजर आते हैं क्या खुशहाल क्यों क् भगवान से जुड़े खुशहाल तभी रह सकते हो जब भगवान का भजन करोगे भगवान के आश्रित रहोगे गंदी बात नहीं करोगे आनंदित होने के लिए जवान का पक्का मन का पक्का और लंगोट का पक्का देहाती भाषा में हम आपको बता रहे नरसीह मेहता जी कह रहे हैं काछ वाच मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी रे जो गृहस्ती है अपनी पत्नी के सिवा किसी के ओर गंदी दृष्टि से नहीं देखता मन को सदैव

पवित्र रखता है भगवान के नाम में शरीर से पवित्र आचरण करता है अपने आप खुशहाल रहोगे और जरा सा पाप हो जाए तो अभी हृदय में जलन होने लगेगी कुछ नहीं है कोई नहीं जानता पर हमारा दिमाग हमको गिराए हमको दबाए हमको निरुत्तरा था वो इतना भयभीत था कि पत्ता खुर के तो एकदम हमको भाई यहां कौन जंगल है तपस्वी हों का स्थल है गंगा किनारा पाप कर्म दूर से देखने से अच्छा लगता है कि बढ़िया गाड़ी है बढ़िया बंदूक टांगे हैं बढ़िया लेकिन उनके अंदर जो चल रहा है एक गरीब आदमी धर्म से चलता है उसके अंदर शांति है सुख है थोड़ा सोच धन का भले हो जाए परिवार के लिए लेकिन वो चैन से सो जाएगा नमक रोटी से पेट भरेगा वो शांत रहेगा और जो पापा चरण करता है आप आप तो नहीं जानते हो क्योंकि आप जैसे कोई बड़ा आदमी दिखाई दे तो आपको लगेगा बहुत सुखी है लेकिन जब हम लोगों से मिलता है ना तब लगता है इनकी कितनी दुर्दशा है लोग समझते हैं 10 गाड़ी पीछे चलती है इतना बढ़िया कपड़ा सब बड़े आदमी है तब लगी कुशल ल जीव क सपने हो मन विश्राम स्वप्न में भी उसे शांति

नहीं मिल सकती इसलिए खुशहाल जीवन धर्मम जीवन भगवान का नाम जप करते हुए अच्छे आ चरण करो और देख लो खुशहाल रहोगे मस्त रहोगे आप विचार करके देखो ना देखो खुशहाल वस्तुओं से नहीं हुआ जाता खुशहाल दिमाग से हुआ जाता है अगर हमारा दिमाग पॉजिटिव हो जाए तो एक बनियान में भी आप खुश रहोगे और नेगेटिव हो जाए तो बहुत बड़े-बड़े कंपनी के कपड़े भी आवे ना तो भी पहन के चलोगे आपको आपसे बढ़कर दिखाई देगा तब लगेगा मेरा क्या है तो जलो ग और जब आप पॉजिटिव है ना तो कि भगवान हमको कम से कम शरीर तो स्वस्थ दिए हमें भगवान ने स्वस्थ बनाया कितनी कृपा वो पॉजिटिव चिंतन करता है जिसको खुशहाल रहना ना उसका पॉजिटिव चिंतन होना अनिवार्य है और बिना निष्पाप हुए पॉजिटिव चिंतन नहीं होता चिंतन सदैव नेगेटिव भागता है क्योंकि उसको दंड मिलना है ना यही चिंतन जब नेगेटिव ज्यादा हो जाता है तो डिप्रेशन में चला जाता है बे मतलब बवत रहता है आदमी बे मतलब उसको एक ही बात सुहाई देती है मतलब कहीं मुझे को हमने देखा ना हमारे पास तो सब तरह के लोग आते हैं तो एक थे

वो बस यही कहते थे एक तरफ खुद मरने के लिए तैयार और डिप्रेशन की दवाई 101 हजार की चल रही क्या है चिंतन बिगड़ गया ना अब उसी चिंतन में राधा राधा राधा राधा और यार हमें कोई मार नहीं तो भगवान है ना मेरे भगवान पॉजिटिव है ना कि यार एक दिन तो मरना ही है और जिस दिन मरना है उस दिन कोई बचा नहीं सकता आज से हम क्यों उसके लिए परेशान हो हम धर्म से चले हम नाम जप करें हम खुश रहे सबसे बढ़िया बात है प्रसन्न रहना खुश रहना यह पॉजिटिव से होगा आपका चिंतन सकारात्मक होना चाहिए और इसके लिए आप में पावर चाहिए व है नाम राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा बड़ा आनंद रहेगा जप के देखो पर आज ही नहीं मिल जाएगा आनंद समय लगेगा जैसे-जैसे आपकी मलिन होता हटेगी वैसे-वैसे खुश होने लगोगे स्वाभाविक खुशी है इतने बड़े भगवान हमारे हैं कितनी खुशी की बात अगर कोई अभी मंत्री या कोई ऐसे आपसे हाथ मिला ले और कह दे चिंता मत करना मैं हूं जब कभी जरूरत और कभी फोन ना उठावे कभी ना मिले फिर भी आपकी छाती चौड़ी हो जाएगी और भगवान कह रहे योगक्षेम हाम हम

तुम केवल अनन्य चिंत तो माम तुम मेरा चिंतन करो पूरा ठेका मैं लेता हूं हमें विश्वास नहीं होता भगवान की बात पर विश्वास नहीं होता तुमसे सच्ची कह रहे हैं एक एक क्षण भगवान तुम्हें देख रहे हैं देख रहे हैं तुम्हें और एक एक बात तुम्हारी सुन रहे हैं पर जब तक तुम सही आचरण नहीं करोगे तब तक तुम नहीं जान पाओगे कि भगवान तुम्हें देख रहे हैं और भगवान तुम्हारी सुन रहे हैं जैसे एक भी ऐसी बात नहीं जिसका उत्तर ना मिलता हो एक भी ऐसी बात जैसे कोई भी बात किसी भी तरह की लौकिक पारलौकिक समस्या जरा सा और अंदर रेखा आई सामने परिणाम उसका तुरंत लगता भगवान ने मेरी सुन ली मेरी बात पहुंच गई भगवान तक क्यों क्योंकि भगवान के सिवा हमारा कोई है नहीं भगवान ही हमारे जीवन भगवान ही हमारे प्राण तो आपके भी तो जीवन भगवान है पर आपने अपने जीवन को माया में दे दिया इसलिए आप भगवान की बात नहीं सुन पा रहे यह नहीं समझ पा रहे कि भगवान मुझे देख ये सच्ची बताए इतना आनंद है कि अब जैसे आपको गुलाब जामुन पवा पूछे बोलोगे मीठा कैसा मीठा है बोले बहुत

मीठा फिर इसके बाद क्या बोल पाओगे नहीं यही कहोगे महाराज खा के देख लो आगे वाली बात ले ऐसे ही भगवान कितना प्यार करते हैं हम तुम्हें हृदय से कह रहे हैं कि अगर हमको वो बात ना तो हम माइक से कह देते देखो भाई अगर अनुभव भगवान ना कराते ना तो माइक से कह देते लेकिन जब अंदर से भगवान तभी लगा कि वास्तविक सुख ऐसे दुख में आनंद रहता है हर समय क्योंकि भगवान से चित्त जुड़ा है ना एक डर होता है मरने का और वह डर खत्म हो गया क्योंकि हमको उन्हीं के पास जाला है जिनका जीवन

भर याद करते रहे चिंतन करते रहे इसलिए खुश है सबसे बड़ा भय मृत्यु का वह भी खत्म हो जाता है जब हम भगवान का भजन करते हैं खुशहाल जीवन जीना है तो भगवान के भरोसे हो जाओ पर परीक्षा होगी परीक्षा होगी ऐसी परिस्थिति में भी कभी मन ने यह नहीं कहा कि चलो घर चलते हैं भारी से भारी कष्ट लेकिन भगवान के मार्ग में चलना तो आज भगवान देख रहे हो ना लौकिक और पारलौकिक दोनों खुशियां चरणों में लूटते हैं परलोक का तो कोई संशय नहीं रहा और लोक में आप देख देखो आज हमारी क्या दशा होती ना लड़का ना बच्चा ना रिश्ता ना नाता किसी से कोई मतलब नहीं बचपन से तो आज ये सब पैदा हुए कहीं और और सब प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं खुशहाल जो खुशी शब्द है जो प्रसन्नता शब्द है वह केवल भगवान से ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचत न का आप सच्ची समझ लो परीक्षा में केवल पक्के होना चाहिए कि आपकी परीक्षा होगी कि सच्चा प्यार भगवान से करते हो और जहां ऐसा हो गया तो भगवान की प्रिया है माया लक्ष्मी जी कौन है भगवान की प्रिया है ना हां वो फिर माता की तरह

दुलार करती माता की तरह दुलार करती इसलिए बहुत भगवान का आश्रय लो पाप ना करो तो खुश रहोगे प्रसन्न रहोगे और आगे से आगे भगवान व्यवस्था करते रहेंगे भगवान ही व्यवस्था करते पूरी सृष्टि तो भगवान ने रची है ना हम अच्छा ये बताओ तुम्हारा शरीर किसने रचा है भगवान ने तो रचा ना तुम थोड़ी इसको बनाया है तो उसी भगवान के आश्रित हो जाओ बढ़िया आनंद रहेगा हर समय खुश रहोगे और वो हर बात संभाल देते हैं सुदा मा जी को कई कई दिन भोजन नहीं मिलता था और सुदामा पुरी बना दिया जैसे

द्वारिका पुरी थला ऐसे सुदामा पूरी थी भगवान सब कुछ करने में समर्थ है उनके एक छोटे से सेवक है कुबेर छोटे से सेवक ऐसे अनंत ब्रह्मांड में कितने वह भगवान केवल आपसे कुछ नहीं चाहते क्योंकि सब कुछ भगवान ने दिया है आपका प्यार चाहते हैं भगवान कहते ना भाव का भूखा हूं मैं और भाव ही एक है भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है हम भाव करें भगवान पर अपनापन कर ले भगवान तो हम सदैव खुश रहेंगे उषा जी कानपुर से राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं नाम जप करती हूं तो कैसे पता चलेगा कि मेरे पाप कट रहे हैं जब हृदय में कोई चिंता ना रह जाए कोई शोक नहीं कोई संताप नहीं कोई उद्विग्न नहीं आंखों से आंसू है मुख में नाम है हृदय में भगवान का ध्यान है उस समय जान लेना आप निष्पाप हो गए हैं जिस समय हृदय में भगवान का ध्यान हो आंखें असु से भरी हो शरीर में रोमांच है सा तरतील कां तारती व स्वयं तर जाता है स्वयं तर जाता है लोकों को तार देता है मम भक्ति युक्त नम पुना तो जब ऐसी पुलकित अवस्था होती है तो उससे लोक का लोक पावन करने की

सामर्थ्य जाए तब जाना जाए कि निष्पाप ज सामने भगवान की छवि है रोमांच हो रहा है अशु प्रवा गदगद सुर नैना सजल दंपति रस रहे भीन इ गति वृंदा विपिन में फिरे प्रेम तन लीन तब निष्पाप होता है निष्पाप होने के तो और भी साधन है लेकिन पाप प्रवृत्ति बनी रहती है तो जैसे हाथी का स्नान हुआ फिर वो सूर्ण से मिट्टी डाल लिया तो स्नान का फल क्या हुआ तीर्थ आटन आदि करके पाप नष्ट किए और फिर पाप कर लिए तो फायदा क्या हुआ भजन से पाप प्रवृत्ति नाश होती है नाम जप करने से अनर्थ का नाश होता है और अनर्थ कराने वाली जो मूल प्रवृत्ति है उसका भी नाश हो जाता है जब हृदय शुद्ध हो जाता है तो फिर रूप छके घूमत रहे तन को तनिक न भान नारायण दृग जल बहे यह प्रेम पहचान हमारी भक्ति जब रंग लाएगी तो सब पाप सब नष्ट हो जाएंगे पाप सा सब हृदय आनंद में भर जाएगा तब समझना चाहिए अब मैं निष्पाप हो गया हूं राजकुमार जी फतेहपुर राधे राधे बाबा राधे राधे महाराज जी महाराज जी अलग-अलग भगवान की पूजा करने से भगवान की प्राप्ति होगी या नहीं पूजा तो भगवान की हो

रही 10 जगह करो या एक जगह करो या 100 हज जगह जाके करो तत्व तो वही है भगवान तो वही है ना तो देख रहा है 10 रूपों में पूजा हो रही है य सब रूपों में भगवान आए तब जो दुर्गा देवी भगवान शिव या जो रूप मान के पूजो या इन रूपों को मान के पूजो जब हम माटी की या पाषाण की या अष्टधातु की या काष्ठ की मूर्ति बनाकर उसमें भगवान की प्राप्ति कर लेते हैं तो फिर इन रूपों में भगवान तो है चल फिर रहे हैं तो हम कहीं भी पूजन करें वो भगवान में ही पूजन होता है जैसे हम कहीं भी हमारा आधार पृथ्वी है ऐसे सब रूपों का आधार भगवान है भाई समझ पा रहे बात गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे सीय राम में सब जग जानी करो प्रणाम जोरी जुग पानी मेरे सियाराम सब रूपों में है सबको प्रणाम करता हूं तो तुम तो आठ द रूपों की बात कह रहे हो आठ द भगवान की बात कह रहे ये सब भगवान अमित रूपों में भगवान है हम जहां भी पूजा करेंगे भगवान के भाव से वहीं भगवान की प्राप्ति हो जाएगी नामदेव जी को कुत्ते में भगवान का दर्शन हुआ भूत में भगवान का दर्शन हुआ एकनाथ जी ने

गधे में भगवान को देखा चराचर जगत भगवान है बस देखने की आंख होनी चाहिए किसी सूज वाली आंख ने पहचान की कण कण में झांकी भगवान की अगर हम भगवान की भावना करके किसी कुत्ते को भी रोटी खवा रहे तो उससे भी भगवान की प्राप्ति हो जाएगी भगवान के रूप तो भगवान है ही और भी जीव जंतुओं के चराचर रूप में भगवान है वो एक है पर अनेक रूपों में खेल रहा है हमको यह ध्यान रखना है वही अंबा है वही पिता है दूसरा कोई नहीं वही परमात्मा जगदंबा बना हुआ है वही परमात्मा शिव बना हुआ है वही राम बना हुआ है वही सिया बना हुआ है वही स्त्री बना हुआ है वही पुरुष बना हुआ वही जड़ बना हुआ है वही चैतन्य बना हुआ है नहीं जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जान सब भगवान ही है हमारी भावना पवित्र होनी चाहिए भावना पवित्र नहीं है तो भगवान की पूजा से आपको भगवान की माया मिल सकती भगवान नहीं मिल सकते भावना पवित्र है तो भगवान मिलेंगे अब जैसे कोई है लाखों रुपया का छत्र चढ़ावे अहंकार करके तो भगवान उसके कई गुना उसको संपत्ति दे देंगे लेकिन भगवान नहीं मिलेंगे

और दैन्य होकर बाजरे की रोटी का भोग लगाया धंदा जाट ले तो भगवान प्रकट होकर पाले दैन्य होकर सुदामा के तंदुल भगवान ने सबरी के भेर भगवान पाए अहंकार कर ले तो फिर पर भगवान में की हुई पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती चाहे जिस भाव से करो तो अगर माया चाहिए तो माया पति है अगर उनकी भक्ति चाहिए तो फिर दैन्य होकर भगवान की आराधना प्रेम एक से होता है हजारों से नहीं होता जब प्रेम होगा तो फिर एक में आ जाए जैसे राम कृष्ण परमहंस जी का प्रेम केवल माता काली में था उन्हीं में

सबके दर्शन करते थे गोस्वामी जी का सियाराम में था गोपी जनों का श्याम में था जित देखो तित श्याम में तो जब तक हमारा प्रेम नहीं होता तब तक ये साधना है साधारण भक्ति जब असाधारण भक्ति आएगी तब फिर बात आ जाएगी फिर अपने प्रीतम का जो रूप चयन किया है उसी रूप के अलावा फिर और नहीं पसंद आएगा समझ रहे हो आकाश जी बुलंद शर हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी जब से वृंदावन से ट्रांसफर हुआ है मन हमेशा खिन सा रहता है किसी से भी बात करने का मन नहीं करता कॉलेज और घर दोनों जगह उदासी सी रहती है ऐसा लगता है बहुत कुछ सब कुछ छूट सा गया है उमर में पुनः मैं फिर से नई नौकरी का तैयारी कर रहा हूं जिससे मेरे को पुनः वृंदावन आने का हो महाराज जी महाराज जी कैसे वैसे ठीक है भक्ति जनित भाव बढ़िया है लेकिन भगवान की सृष्टि के जो कार्य रूपी पूजा है हम कहते हैं इससे उदासीन नहीं होना चाहिए जहां राखो ता रहो मान सुखरास है मैं वृंदावन का हूं प्रियालाल का हूं अगर वह हमें भेजे हैं कहीं दूर और हमारा कर्तव्य है पढ़ाना तो हम यही भगवान

की पूजा समझकर वृंदावन को चिंतवलप्पु हो जाते हैं और शरीर कहीं भी छूटे वृंदावन ही मिलेगा मुझे लगता है भगवान का स्मरण करते हुए आप जो कर्तव्य कर्म जहां कर रहे हो वही करो तो बहुत अच्छा रहेगा ठीक है मान लो आप वृंदावन के लिए कर्तव्य कर्म छोड़ कर के जैसे आ रहे हो और यहां आपको दोष दर्शन होने लगे अपराध बन जाए भजन ना होने लगे तो आपको लगेगा कि वह बात तो नहीं जो मैं सोचता हूं तो हमें लगता है जैसे प्रभु का विधान हो वैसे रहने से ज्यादा अच्छा है प्रभु आज्ञा ज का

जस आई सोते भाति रहे सुख लाई तो आप ऐसा कर लो कभी-कभी जब छुट्टी मिले वृंदावन आ जाओ और नहीं अपने पढ़ाई रूपी कर्तव्य को करो और कभी ऐसा संयोग बन जाए कि आपका पुनः ट्रांसफर इधर हो जाए तो वह सौभाग्य लीजिए और फिर इसके बाद यह तो कुछ समय की बात है इसके बाद वृंदावन वास कीजिए सब मलवा अर्थ व्यवस्था हो गई कुछ समय तक य सेवा हो गई परिवार के कर्तव्यों का पालन करते हुए फिर आखिरी में वनवास करो भजन करो करो लेकिन अभी कर्तव्य का पालन करो ठीक है कर्तव्य छोड़ना मुझे अच्छा नहीं लगता अपने अपने कर्तव्य में जो दृढ़ है यह भगवान की सृष्टि सेवा है अगर इससे भागा जाए तो मुझे लगता है भगवान प्रसन्न नहीं होंगे अर्जुन जी कहते हैं हम सन्यास लेकर भिक्षा का अन्न मांगकर भगवान कहते नहीं युद्ध रूपी कर्तव्य कर्म आया है इसको करो तो हमें लगता है अपने कर्तव्य का पालन करना भगवान को ज्यादा प्रिय है तो यही भगवान की पूजा मानी जाए और वृंदावन का चिंतन करते रहो और कभी-कभी आकर परिक्रमा किया दर्शन किया यह लाभ ले लिया और दिमाग में भर लिया

वृंदावन रोज वृंदावन मन से आओ ठीक है इससे परम लाभ प्राप्त होगा फिर आगे जैसा भगवान प्रेरित करें अभी हमें ऐसा प्रेरित कर अभिषेक अग्रवाल जी ग्वालियर श्री हरिवंश महाराज श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आपको एक ऐसा रोग है जिसमें दिन में कई बार इनको सच जाना पड़ता है तो महाराज जी इनको बहुत मन होता है कि सेवा करें श्री जी कि मंदिर जाए बट इन कारणों की वजह से ये तो जैसे सोच गए ना तो अगर इतनी सावधानी रख लो तो बढ़िया काम बन जाए उतना ही कपड़ा पहनो बाथरूम में तो बंद दरवाजा होता है कपड़े की भी जरूरत आजकल अटैच बाथरूम पराया होने लगे हैं तो कपड़ा उतार के ऐसे टांग दिया सोच गए हाथ धोया साबुन से फिर रज से धोया थोड़ा पैर धो लिए एक डिब्बा पानी डाल लिए मान लो गुदाद द्वार पर गमछ से पूछ लिया कपड़े पहन लिए हो गए पवित्र पर इतना थोड़ा जरूरी है नहीं तो फिर ये वैष्णव सेवा भगवत धाम की ये जैसे दर्शन करने जाना ये सब ये फिर ठीक नहीं रहेगा महाराज दिन में कई बार जाना पड़ता है पर ऐसे आपको दो महीने सोना तो तब

से नहीं कितनी अंतराय में जाना पड़ता है दिन में पाच से सात बार जाना पड़ता ऐसा पूरा 24 घंटा हां तो मुझे लगता है कि कम से कम दो तीन घंटे का समय तो मिल ही जाता है हां तो एक बार पवित्र हो लिए और पवित्र होकर दर्शन आद कर लिए और जब बार-बार आप जाओ तो वृंदावन की रज है ये सबसे परम पवित्र है सोच गए हाथ धोया और रज लिया और ऐसे कर लिया कपड़ा पहन लिए पर कपड़ा उतारना पड़ेगा उतार के फिर जाए फिर जाए और इसके बाद हाथ प पुनः वही कपड़े पहन सकते हैं हां पुनः वही कपड़े पहन रज ले लो र ऐसे थोड़ा ऐसे कटोरी प रख लो कहीं ऐसे रज लिया ऐसे लगा लिया कपड़ा पहन ले हो गया परम पवित्र रज हैसे आपसे जब दो महीने से सुना है आपको श्री जी का नाम तो मतलब उनके नाम से ऐसा लगता है कुछ परेशानी नहीं कि अपने आप सब होता जाता है चित्त को यदि प्रभु से जोड़ दिया जाए तो हर परेशानी आनंद पूर्वक सहा जा सकता है और अगर प्रभु से ना जोड़ा गया तो अभी एक कथ मेरे पास विश्व के सब सुख है पर मैं खुश क्यों नहीं हूं बहुत काम का प्रश्न किया बिना श्री कृष्ण

के प्रसन्न नहीं र सकते ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा सब कुछ है पर श्री कृष्ण तुम्हारे जीवन में नहीं तो कुछ नहीं है और कुछ नहीं है और श्री कृष्ण तुम्हारे जीवन में सबसे बड़ी बात तुम्हारे जीवन की वचन नाम जप करो कोई पूर्व प्रारब्ध है जो अपने को कष्ट दे रहा है उसको सहते रहो और दो तीन घंटे के लिए जो पवित्रता का अवसर मिलता है उसमें दर्शन है शास्त्र स्वाध्याय ठाकुर सेवा कर ली हां हर परिस्थिति को निर्वाह करना सीखो लड़ना सीखो उना नहीं घबराना नहीं मस्त रहो पहले

तो लगता था शरीर कैसा खराब सा है पर दो महीने पहले ही को सुना मतलब य से तब से पूरा श्री जीी में मनो ग तो तब से लग ठीक है है तो है अपन तो करेंगे जितना श्री जी क अरविंद गौर जी नॉर्वे श हरिव श्री हरिवंश गुरुदेव आपके चरणों में कोट कोटि प्रणाम म जी इनका प्रश्न है कि एक ऐसे देश में रहते हैं जहां गर्मियों के दिनों में जून अगस्त में जो तीन महीने रहते हैं उसमें सूर्य भगवान 21 से 22 घंटे उदय रहता है महाराज जी और दो से तीन घंटे ही रात होती है ऐसा कु होता होगा

नहीं पहाड़ों का क्रम है ना हां जो उसम महाराज जी कह रहे कि जैसे ब्रह्म मुहूर्त में उठने का तो वहां हम कैसा विधान बनाए कि हमारी शास्त्री पद्धति और देखो छ घंटा सो के जब उठो तो उसे ब्रह्म मुहूर्त मान लो जब आप छ घंटा सो छ सात घंटे गृहस्थ को मेहनत कर ने वाले आदमी को सोना चाहिए तो जब आप उठो भोर भया हमारे लिए अब आप अपना क्रम देख लो और उसी समय ब्रह्म मुहूर्त वाली अपनी सेवा शुरू कर दो क्योंकि दोनों उल्टा है मतलब गर्मियों में तो 21 22 घंटे धूप होती है और ठंड में जैसे अभी नवंबर दिसंबर है तो 21 22 घंटे रात होती है नहीं नहीं आप छ घंटे सहन वग के बाद ब्रह्म मुहूर्त मान लो देखो जिस क्षण हम भगवान का भजन करते हैं वही क्षण पवित्र जिस समय जिस दिन जिस महीने जिस जीवन में भगवान का सुमिरन है वह सब पवित्र है परम पवित्र तिथि परम पवित्र क्षण परम पवित्र जीवन उसी का उसी समय जो भगवान से जुड़ गया समझ रहे ना ब्रह्म मुहूर्त हर समय हमारे लिए क्योंकि हम ब्रह्म का हर मुहूर्त में चिंतन करते हैं यहां जो एक पद्धति बताई गई है

वह साधारण की आप उठो अर्घ आदि दो हम हर समय उसी ब्रह्म में रहते इसलिए हर मुहूर्त ब्रह्म में समर्पित हमारा हर मुहूर्त ब्रह्म में है तो जब जगो तब गोविंद का स्मरण करो तब उनके चिंतन में र जब सोने जा रहे हो तब उनके चिंतन में सहन करो जब जगो उनके चिंतन में जो समय मिला उसी को ब्रह्म मुहूर्त मान कर के आराधना में शुरू कर दो ठीक है हमको आराधना करनी है समय की नहीं परमात्मा की हर समय भगवान का स्मरण भगवान के स्मरण जैसे तुम बच्चा है ना अपवित्र पवित्र वा सर्वा वस्था तो पवा यह स्मर पुंडरी कक्षम सवा भतरा सुच अपवित्र हो या पवित्र जो कमल नयन भगवान श्री कृष्ण का चिंतन करता है उसी समय पवित्र हो जाता है बाहर और भीतर दोनों जगह सवा अभ्यांतर सुच जब पंडित जन कार्य करवाते ना मंगल तो कहते ले जल ओम पवित्रा पवित्रो सर्वा वस्तो पवाया स्मत पुंडरीकाक्ष स्यात जल छिड़क ले ऊपर पवित्र हो गए तो उस का अर्थ ये है अपवित्र पवित्रो वा अपवित्र हो या पवित्र हो सर्वा वस्था तो पिवा किसी भी स्थिति में हो जिस समय कमल नैन भगवान का

सुमिरन करते हो सवाया अभ्यांतर सुची वो भीतर और बाहर से परम पवित्र हो जाता है ये तो बाह कुछ सेवा के लिए नियम है नहीं तो वो परम पवित्र है जो हर समय भगवान का चिंतन कर रहा है तीर्थ कुर्वंति तीर्था वो जहां चरण रख दे तीर्थ बन जाएंगे खूब भगवान का नाम स्मरण करो वही समय सार्थक है जिस समय भगवान की स्मृति चल रही भगवान की लीला कथा सुन रहे भगवान के प्रेमी संत जनों का संग कर रहे वही समय सार्थक है क्योंकि वहां क्रम ऐसा नहीं जैसा अपने भारत में है तो जब जगो तभी ब्रह्म मुहूर्त मान करके अपने दिन चद कर महाराज जी इसमें एक प्रश्न था महाराज जी महाराज जी जैसे जो साधना में लगना चाह रहे हैं उपासना में बट रात को जिनकी ड्यूटीज होती हैं या ऐसे होते हैं तो वो भी ऐसा मान ले कि जिस समय हम जगे तो हम भजन में लगे से कोई चार बजे तक तो मेहनत करके आया है अब वो आलस्य में है तो लेट जाए भगवान का स्मरण करके और चार घंटे सो ले इसके बाद जब उठे तब फिर वही प्रात कालीन वाले दिनचर्या करें भगवान हम सच्ची आपसे कहते हैं इन सब बातों का

महत्व है भगवान की स्मृति से अगर भगवान की स्मृति नहीं है तो यह सब कर्मकांड जितना भी के यह पुण्य बन सकता है भगवत प्राप्ति नहीं करा सकता तो भगवत प्राप्त के लिए हर समय भगवत स्मृति में अखंड स्मृति में रहना है तो हम हर समय भगवान की आराधना में रहे तो यह सब बातें खत्म हो जाएंगी वो सत्संग में आता है ना गुरुदेव तो दोष का डर लगता है देखो सत्संग क्या होता है सत्संग है मेडिकल स्टोर मेडिकल स्टोर है योग सांख ज्ञान भक्ति वैराग्य सब सब कुछ उसमें चल रहा है इसीलिए डॉक्टर से लिखा के मेडिकल स्टोर से दवा लो तो लाभ मिलेगा और मेडिकल स्टोर से तो फिर परेशानी आ जाएगी नहीं क्योंकि भक्ति योग का कभी वर्णन हो रहा है कभी सांख योग का वर्णन हो रहा है कभी अष्टांग योग का वर्णन हो रहा है कभी कर्म योग का वर्णन हो रहा है तो आप सब सुनकर परेशान हो जाओ क्योंकि सब एक साधक थोड़ी धारण कर सकता है आपको यह ध्यान रखना है आप भक्ति योग के पथ के पथिक है तो जब सत्संग में भक्ति योग की बात आवे तो समझो यह दवा हमारी है और नहीं ऐसे पूरा मेडिकल

स्टोर है भगवान की महिमा सुन लिया चल दिया समझ रहे हो नहीं ऐसे परेशान हो जाओगे कई परेशान हो जाए अब जब अष्टांग योग का वर्णन होगा तो पद्मासन और सिद्धासन में साधक को इतने मिनट बैठना चाहिए प्राणायाम करना चाहिए यह नियम वो वो बेचारे परेशान है कि सुबह मंगला करे कि पदमासन लगा के बैठे ठाकुर जी की मंगला करेगी पदवा तो तुम्हें कौन कह रहा है तुम भक्ति योग के हो तो अपने मार्ग को समझो वो तो अष्टांग योग का वर्णन हो रहा है और कभी सांख योग का वर्णन होते स्थूल सूक्ष्म कारण सब माया कृत है तू साक्षात ब्रह्म है बोले हम तो ब्र की आराधना दास भाव से कर रहे हैं तो फिर गड़बड़ हो जाएगा हम सत्संग सुने विवेकवानी होकर मेरे मार्ग की जब बात आएगी तो उसे हम स्वीकार करते हैं नहीं भगवान की चर्चा है हम सुन लेते हैं समझ रहे हो हा जैसे अभी कर्मभूमि का भी आया था कि भारत ही कर्मभूमि है फिर डर कि हम विदेश में काम कर रहे हैं तो फिर हम हमारे कर्म नहीं सकल भूमि गोपाल की आ में अटक कहा समझ रहे ना ये सब भगवान की भूमि है जहां हम

भगवान को पुकारेंगे वही भगवान ना आ जाए आप जिस देश में रहते हो वहां से अगर पुकारोगे तो वृंदावन दूर थोड़ी तुम्हारे तुम्हारे सामने वृंदावन दिखाई देगा ये जड़ वस्तु थोड़ी है तो चैतन्य सच्चिदानंद और सच्चिदानंद घन सर्वत्र होता है कहीं से भी उसकी याद करो वैसे ही आपको अनुभव में आएगा ठीक है वो तो प्रसंग वसा जिसे चल रहा है प्रसंग तो फिर भारत भूमि की तो महिमा है भारत के समानता थोड़ी हो सकती जहा गंगा यमुना राम कृष्ण हरि का अवतार और बड़े-बड़े पावन महात्मा जो सिद्ध जीवन मुक्त परमहंस यह जीवन मुक्त कहीं नहीं मिलेगा भगवत प्राप्ति कहीं नहीं स्वर्ग नर्क ये दो की चर्चाएं हैं यह भारत का ही ज्ञान है अगर कहीं बाहर प्रकाशित है भारत का जीवन मुक्त होना जितेंद्रीय होना ब्रह्मचर्य धारण करना पाति व्रत धारण यह सब भारतीय संस्कृति है यह अन्यत्र नहीं प्राप्त होगी पर हम भारती होकर के बाहर काम कर रहे हैं तो अपनी भारतीय संस्कृति का पालन करें तो हम भारत में ही आएंगे भगवान की शरण में जाएंगे ठीक है अभिषेक जी अलीगढ़ से श्री

हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी अत्याधिक सामाजिक होने के हानि लाभ भी है महाराज जी मतलब बहुत ज्यादा सामाजिक यहां चले जाओ वहां चले जाओ और सामाजिक रिश्तों को निभाते निभाते तो इसके हानि भी है और बहुत सारे लाभ भी है लाभ तो कुछ नहीं भाई प्रपंच है लाभ तो कुछ नहीं किसका प्रश्न है प्रपंच हे प्रभु लाभ तो भगवान का विस्मरण हो गया तो लाभ कहां लाभ कहा हनुमंत बिपति प्रभु सोई जब तब सुमिरन भजन न होई हानि हरिवंश के नाम अंतर परे लाभ हरिवन

सु चरत बानी यदि हम भगवान की भावना में डूबे हैं नाम जप करते हुए हम कोई कार्य कर रहे हैं तो प्रपंच नहीं वो आराधना है और बहुत लो ों से मिलना प्रपंच शब्द है बहुत रूपों में भगवान से हम मिलते हैं बहुत रूपों में भगवान की सेवा करते हैं तो सार्थक है बहुत लोगों से मिलते हैं बहुत हम उत्सवों में सम्मिलित होते हैं तो फिर संसार किता आ जाएगी वही उपासना हो जाएगी वही वासना हो जाएगी उपासना में आ जाओ सब सही हो जाएगा नहीं नाम जप करो और सब में भगवान की भावना कर लो दिखाई तो नहीं दे रहे पर है बिजली तो वही है हे भाई एक लाइट दे रहे एक ठंडी ये हवा फेंक रहे बिजली इसमें कोई और नहीं है हीटर में गर्मी फेंक रहे इन यंत्रों के कारण उसका प्रभाव अलग-अलग है लेकिन बिजली एक है पावर एक है सब में परमात्मा वही है सतोगुण रजोगुण तमोगुण इन तीन के प्रभाव से अलग-अलग खोपड़ी रची है तो कोई राक्षसी स्वभाव का कोई क्रू स्वभाव कोई दयालु स्वभाव का कोई भक्त है कोई अभ क्त है लेकिन पावर सम में परमात्मा एक ही है ज्ञानी वही है जो सब में

परमात्मा को देखता है अगर हम परमात्मा देखकर व्यवहार करें तो बहुत बढ़िया आनंद आ जाए पर उसमें यह नहीं कि हम उसकी पूजा करेंगे अलग-अलग पूजा है अगर आप अधिकारी पद पर हो और कोई दोषी है कोई दुष्ट स्वरूप तोव भगवान का भाव रखेंगे लेकिन डंडा चलाएंगे बहुत विस्तृत समझ कर नहीं है ऐसा नहीं कि कोई अपराध कर रहा है हम हे भगवान आप ऐसा आतंक रूप रखोगे तो हम आपका वध भी कर देंगे पर हो ग भावना हमारी भगवान की होगी तो कह दे जिस पर भगवान की भावना उसका वध कैसे कर सकते हो तो भीष्म पितामह जी विपक्ष में है और सामने श्री कृष्ण अर्जुन के साथ है जितने बाण अर्जुन के मारते हैं उतने श्री कृष्ण के मारते हैं और महा भागवत श्री कृष्ण के परम भक्त भीष्म पितामह जी है ना यहां तो भावना करने वा तो सामने खड़े हैं और बाण तान के तो जब हमको आप रोल दोगे तो हम अपने रोल में कमी नहीं करेंगे तो आपका एक स्वांग है समाज में जाना जो भी कार्य हो उसे आप भागवती बना लीजिए तो वह आपका बंधन कारक नहीं रहेगा ऐसे तो बंधन कारक है प्रभु फिर तो प्रपंच है फिर

तो बहुत फसावो होगी कहीं आ हम में ठेस लगेगी बहुत प्रपंच है इसलिए नाम जप करो और भगवत भाव से अपनी सेवा करो बलराज जी मुंबई से राधे राधे मर जी इनका कहना है कि बहुत लोगों ने अपनी मां नहीं देखी होगी किसी ने पिता नहीं देखे होंगे किसी ने दोनों नहीं देखे होंगे बट मैंने सपने में भी कभी अपनी मां का मुख नहीं देखा कि कैसी हो थी वो ब कह र इसलिए मैं भगवान से बहुत नाराज हूं और मैं पूजा पाठ भी नहीं करता फिर इसीलिए तो मतलब और हम तो जानबूझ के माता-पिता के मुंह को छोड़ा तो अपने भगवान में मां भी देखा और पिता भी देखा और दोस्त भी देखा और रिश्तेदार भी देखा और परम धन भी देखा त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वम मम दे सबकी माता प्रभु है सबके पिता प्रभु बच्चा प्रभु से नाराज होने से क्या होगा अच्छा जैसे आकाश से नाराज हो जाओ तो क्या करोगे आप बताओ क्या करोगे आकाश से आप नाराज हो जाओ भगवान का एक रचा हुआ है ना अब आप क्या कर लोगे आकाश का धूल मारो ईट मारो कुछ कर

आकाश का कुछ कर पाओगे तो ऐसे आकाश तो एक अंश में परमात्मा से प्रकाशित है वो अनंत महिमा शली है देखो हमारा प्रारब्ध था कि हमारी मां हमको जन्म देकर अंतर ध्यान हो गई अब हम सब माताओं में मां नहीं देख सकते यह वही तो जगदंबा मां है ना हमारी मां इन्हीं किसी किन्हीं रूपों में होगी जैसे हमारी मां थी व ये मां ही है हम भगवान की सृष्टि में अपनी मां को देखें अपने प्रभु को जब हम प्यार करेंगे और अगर आज भी कहो नाम जप करो और प्रभु से कहो मैंने देखा नहीं अपनी मां को मैं देखना चाहता हूं तो वही रूप रख के आ जाएंगे क्योंकि वही थे बच्चा मां कोई और थोड़ी थी वही तो थे देखो ये शरीर पांच भौतिक है लेकिन इसमें जो पावर है वह परमात्मा है इसमें जो बिजली है ना वह परमात्मा जैसे आप हो बच्चा तो आपका शरीर तो यह है आप अपने को जानते हो बच्चा नहीं जानते अपने को नहीं जानते अपने शरीर को जानते हो गुरु जी मैंने लिखा था एक छोटा सा लाइन जी कि तू कहां है तुझे ढूंढू मैं रोज दरबदर एक जगह बता जहां तेरी एक तस्वीर मिल जाए अब जो हुआ सो हुआ

सुन मेरी फरियाद मेरे ईश्वर ले ले जान ताकि मेरी रूह मेरी मां की रूह से मिल लेकिन अगर जान देने वाली बात है तो हमारी आज से बात पकड़ो राधा राधा राधा राधा जबान से ना छूटने पावे अगर मां सामने ना आ जाए तो मुझे बताना वही मां है वही सामने आएगी तो मां कौन है भगवान है हां तो हम अगर भगवान का नाम जप करें और प्रार्थना करें तो जो रूप चाहे वो देख ले जो रूप क्योंकि वो रूप केवल भगवान के पास है तुम्हारी मां को केवल भगवान जानते हैं और भगवान रूप हर रूप धारण कर सकते सर्वर ूप विश्वर ूप भगवान है तो बच्चा अगर वास्तविक तुम्हें मां का दर्शन करना है तो हम तुम्हारी मां का परिचय बता रहे जगदंबा अंबा वही विविध रूपों में आती है खूब नाम जप कर प्रार्थना कर और अगर सामने ना आ जाए तो कहना देखो भजन में बच्चा बहुत बल है बड़े-बड़े आचार्यों के दर्शन आज की मतलब 30 35 वर्ष पहले गंगा किनारे गुरु नानक साहब के दर्शन बड़े-बड़े महापुरुष तुमको कैसे बता सब गुप्त बातें हृदय की होती क्या देखना चाहते हो जब भगवान को देखने की लगन लग जाएगी ना

सब कुछ देखने में आ जाएगा क्या देखना चाहते हो देवर्ष नारद बड़े-बड़े महात्मा जो है वह सब मिलते हैं एकांत में दर्शन देते हैं भक्तों को आप ला समझला कि हा जो रूप चाहो रूप नाम जप करो देखो ऐसे कुछ फर्क नहीं पड़ता उस तत्व को उसको फर्क तब पड़ता है जब रात दिन भजन करके उसको विवस कर दो उस अव्यक्त परमात्मा को विवस कर दो प्रकट हो जाए देखो गोपी जन रो रो करके पुकार रहे हैं तो भगवान उसी समय प्रकट हुए रुदु सु श्रम राजन कृष्ण दर्शन लालसा कबीर दास जी कहते हैं बिन रोए किन पाइया प्रेम प्यारा एकांत में बैठकर रो हे भगवान तो मां पिता आपको सच्ची कह रहे सबके भगवान ही है जान नहीं पा रहे हम जानने अगर मां को आप भगवान रूप में देखो पिता को भगवान रूप रू में देखो तो वही भगवान का साक्षात्कार करवा देंगे विट्ठल भगवान जो है आज वो माता-पिता की सेवा का स्वरूप प्रकाशित करने के लिए ऐसे आज भी खड़े पुंडर जी अपने माता-पिता को भगवान मान कर के सेवा तो हम भगवान को माता-पिता मान ले तो जो चाहे वो दर्शन कर सकते हैं ठीक है बच्चा हा खूब

नाम जप करो निराश मत हो यह सब अम्मा ही है हम जब ऐसे देखते हैं तो इन्हीं में सब अम्मा दिखाई देती मा इसी में विश्वास नहीं हो पाता कई लोग ऐसे हैं आपके पास आने से पहले काफी बार आपको देखा बहुत अच्छा लगा बहुत लोगों ने समझाया कि यहां जा कोशिश कर काफी दिन से परेशान होने के बाद आप तक पहुंचा और आज विश्वास हुआ अब परेशान मत हो देखो हमको अपना दोस्त मान लो हमारी बात मान लो ठीक है और प्रसन्न मन से रहो नाम जप करो तुम्हारे ऊपर मां का बहुत छत्र छाया है मां केवल वो स्त्री नहीं है वो जगदंबा भी है वही है या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता बुद्धि रूपेण संस्थिता कितने रूप उनके हां चराचर में वही अम्मा है अम्मा के सिवा कोई नहीं बप्पा भगवान शिव और अम्मा जगदंबा उली से सब है मस्त रहो एकदम और तुम देखना चाहते हो नाम जप करो राधा राधा जो देखना चाहोगे वो सब सब कल्याण लाम जप करो पर तुम्हें हम धन्यवाद देते हैं कि अपनी मां से इतना प्यार कर वाला कोई आप जैसे जवान बालक आज तो तिरस्कार करते हैं माता-पिता का बच्चे आपसे सीख

लेनी चाहिए कि मां का तुमने देखा नहीं तो तुम तड़प रहे हो और जिनके हैं वह तड़पा रहे व त पा खानपान व्यवस्था लिए बहुत धन्यवाद और आगे बढ़ो परमार्थ के पथिक बनो अरे जी आप बाबा है 88 साल उम्र है आपकी 14 वर्षों में हाथ से राम राम करके रामायण का पूरा लिखा है महाराज जी आपने चार खंड अच्छा ल कांड और इनकी इतनी भावना है कि जो रिफल से लिखा है ना वो भी रिफल संभाल के रख ताकि वो भगवान का नाम लिखा है तो मैं उसको कैसे भें सकता जैसे ये बालकांड हैा शद अच्छा पूरी छोटे छोटे अक्षर में राम राम राम धन्य धन बहुत बहुत अरे वाह बहुत सुंदर अच्छा हर अक्षर पर नाम लिखा है राम राम राम राम लेकिन बहुत बड़ी एकाग्रता और बहुत सूमता मतलब मज 14 साल लग गए और बड़ी क्लेरिटी भी है बहुत आपका एक भाव था कि जैसे चार पांच कांड हैय सुंदर कांड पूरा तो महाराज जी कह रहे थे कि ये संपत्ति है एक मतलब अमूल्य संपत्ति है जो ऐसे हाथ से तो इसका संरक्षण या इसका सुरक्षा हम तो यही चाहेंगे कि अगर आपके वंश में पुत्र परिवार के जन हो और वह इसको सिंहासन पर

रखकर आरती पूजा करें और रोज इसकी दो चार दो चार चौपाई भगवान को रोज पढ़ता हूं उसको पूरी होती वापस चालू करता आप नहीं आपका तो हो ही रहा है आपके बाद की बात महाराज जी कह रहे इसकी रक्षा सुरक्षा संरक्षण हां जो भी आपके संतान है जी अनुकूल है इनको पाठ करेंगे महाराज जी का कहना है कि घर के सिंहासन में एक सिंहासन बना के वहां विराजमान करके रोज इसकी आरती करें आपने आपके आगे वाले आपने प्रश्न था ना आपके जाने के बाद यही मैं चाह रहा बहुत बड़ी वस्तु बहुत बड़ी वस्तु हम आपका बहुत आदर करते हैं क्योंकि बहुत सूक्ष्म विषय लाओ इनको दुपट्टा बहुत सुंदर और यह अपने घर में ही विराजमान घर में विराजमान रख ये साक्षात मंदिर है इसमें भगवान विराजमान है हा इसम भगवान पेज की बड़ पूरी हां बहुत सुंदर बहुत सुंदर बहुत सुंदर तन्या जी ग्वालियर से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी आज खूब नाम है धन है सारे सुख है पर कठिनाइयों को पार करते करते मुझे पता ही नहीं चला कि मैं खुद को खो बैठी मैं दिखा तो रही हूं पर मैं खुश क्यों नहीं हूं

महाराज जी अभी पहले बैच में यहीं बैठ के एक व्यक्ति ने पूछा था कि मैं खुश होना चाहता हूं मैं शांत प्रसन्न होना चाहता हूं और वह जगत के किसी भी भोग में नहीं है किसी भी वस्तु में नहीं है किसी भी व्यक्ति में नहीं है कि अमुक व्यक्ति मिल जाए तो मैं खुश हो जाऊं असंभव वह अगर मिल भी जाता है तो उसके बाद फिर दूसरी मांग हो जाएगी कुछ दिन बाद व हमारे मन का एक स्वभाव है नवम नवम मन की एक मांग है नवम नवम कुछ भी हो कुछ दिन बाद व उससे हट जाता है और एक नई खोज करता है जब तक उसे परम नहीं सुख मिल जाएगा तब तक वह रुकेगा नहीं पक्का समझ लो आप रोक के दिखा दो परम सुख भगवान के नाम में भगवान के चरणों में है फिर हमने केलिए क चक सम महा भरथ जी चक्रवर्ती सम्राट कहते हैं जहां से सूर्य उदय होता जत होता है एकत्र सप्त दप म मंडल का सम्राट उसने विचार किया भरथरी जी ने कि सुख कहां है दिमा बहुत बड़े विवान महापुरुष थे उन्होने खाने में भी सुख एक सीमा तक है रुपया पैसा खजाना इसलिए प्रिय क्योंकि इससे भोग सामग्री मिलती है पैसे की मात्र

क्या है भोग सामग्री मिलती है अगर पैसे से भोग सामग्री नहीं मिले तो हम कह रहे तुम्हारे को नाम जो है एक ट्रक 000 आप कर दिया जाए 2000 का नोट आपके किसी काम आएगा क्या आप बेकार आग लगा दो 00 क्योंकि उससे सामान मिलती है रुपए का महत्व है वस्तु वस्तु भोगने के काम में जो आती है पहनना उड़ना सब इसके बाद एक काम आंतरिक सुख की मांग होती काम इसको बहुत समझ के देखना केवल अंतिम सुई जाकर रुकती काम में शरीर भोग स्पष्ट वर्णन है सब सुख एक तरफ और मन की एक मांग होती शरीर भोग वो भी नवम नवम नवम नवम भरथरी जी ने पूरे विश्व में ऐलान कर दिया मैं उसे पटरानी बनाऊंगा जो मुझे पसंद आ जाए सब सुंदरियां देश अभी मतलब सप्त द्वीप महि मंडल मतलब विदेश सब तो एक पिंगला नाम की सुंदरी जिसके आगे सब सुंदरियां फेल थी भरतरी जी को उसने पसंद किया भरतरी जी ने उसे पसंद अब वो तो कोई साधारण पुरुष तो थे नहीं तो उन्होंने कहा कुछ वर्ष में राज का बिल्कुल नहीं करूंगा विक्रमादित्य उनके भाई थे बहुत बड़े प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट वही बने जाके आगे

विक्रमादित्य महान बलशाली राजा थे उनके छोटे भाई थे उनको राजपद दे दिया और कहा मैं केवल देखूंगा भोग में है कितना सुख वैज्ञानिक दृष्टि उनकी अब रात दिन अच्छे-अच्छे पदार्थ खाना चक्रवर्ती सम्राट थे पिंगला के साथ रहना पिंगला ने एक दिन खिड़की से झांक के देखा बलशाली अश्व की सेवा कराने वाला अश्व पाल व समझा रहा था अपने सेवकों को ऐसे रानी ने देखा और आकर्षित हो गई और हुक गुम किया दासी को अपाल से बोलो अमुक जगह मिले तो दिन में महाराज सन करते थे तो दिन में जब सोते होते त व अपाल से मिलने लगी अपाल से उसका शारीरिक संबंध हो गया विक्रमादित्य ने को जब सूचना मिली तो उन्होंने कहा कि मैं महाराज से मिलना चाहता हूं सेवक से कहो बहुत प्रवीण थी पिंगला उसको भनक लग गई दासी के द्वारा कि विक्रमादित्य आपकी चाल को जान गया है भरथरी जी से उन्होने कहा कि आप अपने भाई को क्या बहुत अच्छा समझते हो मेरे ऊपर व गंदी नजर रखता है प्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम देवन जा नाम कुता मनुष्य जो कपट छल करने वाले स्वभाव वाले होते उनका अलग अब

विक्रमादित्य ने कहा मैं भ्राता श्री से मिलना चाहता हूं और उसने पहले ही क्लियर कर दिया तो विक्रमादित्य के पास क्रोधित हो के उनका मैं कभी नहीं समझता था तोत ऐसी दृष्टि तो उ कहा भैया हम जो बात बताना चाहे मैं समझ रहा हूं कि तू यही तो कहना चाहता ना पिंगला गलत है तो उन कहा हां भाई गलत है हमारे पास बोले तुम कितने सही निकालो इसको मंत्री से आदेश किया इसको देश निकाला दे दो बेमतलब अब विक्रमादित्य ने मंत्रियों से कहा भाई इस समय हमारे उसके शासन में है जीवन इनका बहुत खतरे में है संभालना राज्य और मैं अमुक जगह जंगल में रहूंगा जरा भी खतरा हो तो मुझे बता देना पर भाई की आज्ञा का पालन करने के लिए जो अश्व पाल था वो महाराज की नृत्यांगना थी दरबार में उससे उसकी मित्रता थी अब वहां एक नगर में ब्राह्मण गरीब था उसने तपस्या की देव राजेंद्र को प्रसन्न करने के लिए देव राजेंद्र प्रसन्न हुए और एक फल दे दिया कहा इसको खाओगे तो अमर हो जाओगे और अंतरध्यान हो गए उसने कहा मैं गरीब आदमी धन चाहता था अमर होक क्या करूंगा तब

विचार आया कि धर्मा त्मा चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरथरी को दे तो वह हमें धन दे देंगे ऐसा ही किया महाराज की जय जयकार हो आज तक दरबार में नहीं आए थे लेकिन ब्रह्म ऋषियों को जाने का आदेश था वह गए महाराज की जय जयकार हो महाराज मैंने तपस्या के द्वारा अर फल प्राप्त किया है मुझे धन दिया जाए तो उन्होंने खजाने में कह दिया जितना मांगे धन दे दो व अमर फर लिया और विचार किया मैं अमर होकर क्या करूंगा अगर पिंगला अमर रहेगी तो पिंगला को दिया खा लो पिंगला ने तुरंत विचार

किया मैं अमर होकर क्या करूं अगर अश्व पाल जीवित रहेगा तो अश्व पाल को दे दिया अश्व पाल ने सोचा मैं अमर हो के क्या करूंगा जो हमारी नृत्यांगना महाराज की है वह अमर हो जाए तो जब तक जीवित रहूंगा नत नृत्यांगना ने सोचा मैं अमर होकर क्या करूंगी महाराज को समझ रहे ना देखो जब पोल खुली होती है तो मैं अब व जो नृत्यांगना थी उसने मंत्री से प्रार्थना की कि महाराज से मैं मिलना चाहती हूं आदेश आ तो उसने कहा कहा महाराज ये अमर फल है आप इसे पा लीजिए आप जैसा धर्मात्मा राजा अमर होना क ये सच्ची बता तुझे अमर फल कहां से मिला क्योंकि तपस्या से ब्राह्मण ने प्राप्त किया तू वैस तुझे कहां से प्राप्त बोले महाराज ये प्राण क्षमा किए जाए हमारी दोस्ती है अश्व पाल से अश्व पाल जो महल के नीचे ही उन्होने कहा जाओ किसी से कहना मत अश्व पाल को बुलाया बोला जानते हो हम तुम्हें क्या कर सकते हैं तो कांप रहा था पहले से बीच सभा में आरे से चिरवा जाएंगे अभी तुझे और अगर तू सत्य बोल देगा तो तुझे क्षमा कर देंगे बिल्कुल कोई दन बोले महाराज

पिंगला जी ने दिया क्यों पिंगला से तुम्हारा क्या संपर्क बोले विक्रमादित्य ठीक कह रहे थे हमारा पिंगला से शारीरिक संबंध है महाराज भरथरी के होश उड़ गए मुझ चक्रवर्ती सम्राट से वो खुश नहीं पिंगला को बुलाया सभा में आज सभा में उतर के गए पूरी सभा लगी हुई थी उनका देखो ब्राह्मण ने अमर फल दिया था पिंगला ने खाया मैं तलवार से इसे काटू ये मरेगी नहीं जी अरे महाराज तो उनका सत्य बोल दे तो तुझे छोड़ दूंगा नहीं तो अभी सूली पर चढ़ दूंगा तो उन्होने कहा महाराज ऐसी गलती

हमसे हो गई कि हमने वो फल नहीं खाया अश्व पाल को दे दे मुकुट उतारा और कहा धिक्कार इस संसार के सुख को कि मुझ सर्वांग सुंदर पु पुष्ट चक्रवर्ती सम्राट से यह तृप्त नहीं है और महारानी से वह अश्व पाल तृप्त नहीं है अश्व पाल वैश्या से प्यार ये क्षुद्र काम किसे व महान वैरागी हुए जिनके सूत्रों को वैरागी जन पढ़ते हैं भरथरी सतक है उनका तो संसार में अगर कोई तृप्त होता है तो भगवान की भक्ति से होता है नहीं तो भोगों से तो हो ही नहीं सकता है आज तुम्हें प्यार कोई कर

रहा है और तुमसे सुंदर मिल जाएगा कल वो उसे प्यार करने लगेगा परसों तीसरे से करने आज तक किसी की तृप्ति हुई हो तो हमें बताओ भोगों में कहीं तृप्ति नहीं हो सकती कहीं सुख बढ़िया बहुत सुंदर बुद्धि आपकी है जो आपको अनुभव करा रही कि सब कुछ होते हुए भी एक ऐसा स्थान खाली है जहां लगता है वो नहीं है जो मैं चाह रही हूं वो श्री कृष्ण है वो प्रभु है यदि उनसे चित्त जोड़ लोगे तो निहाल हो जाओगे जैसे मीरा जी कहते हैं मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरों न कोई निहाल हो जाओगी अभी थोड़ा बुद्धि पवित्र है जो आपको य अनुभव करा रही वास्तविक मुझे जो चाहिए वो नहीं है वह है परमात्मा वह है प्रभु हम कह रहे हैं यहां तक सोने से लाद दिए जाओ केवल मान्यता ही तो है ना मान्यता का सुख है ये नहीं बताओ मीठा लगता है कि खट्टा लगता है क्या सोने में है केवल वो महंगा है और उसकी मान्यता है इसलिए इसलिए हमको लगता है नहीं 4 लाख योजन का सोने का पहाड़ है एक जिसका नाम सुमेरु है भगवान की माया में रत्न गर्भा पृथ्वी को कहा गया है जैसे गेरू निकलती है ना

जैसे खड़िया निकलती चूना निकलता है ऐसे यहां सोने चांदी की धातुओं की यहां खजाना है पृथ्वी में अब वो तो भगवान जब अवतरित हुए थे तो अपने आप सब भूमि से प्रकाशित हो गया हम लोग इन सुखों से कभी तृप्त नहीं हो सकते क्योंकि हम सच्चिदानंद के अंश है हमारी मांग सच्चिदानंद है नहीं आप मान लो इतने बड़े-बड़े धन लेकिन वो भी अशांत है आप ये मत समझना अशांत है क्योंकि जब तक भगवान नहीं मिलेंगे तब तक हमें शांति नहीं मिलने वाली कुछ भी भोग लो कुछ भी कर लो और देखो शांति कैसी

और तृप्ति कैसी जब केवट कठोता में भगवान के सामने जल लाके उनके चरण पखार रहा है तो भगवान सिया जी की मुंदरी दे रहे हैं सिया जी की मुंदरी लेकिन वह क्या कह रहा है अब कछु नाथ न चाहि मोरे दीन दयाल अनुग्रह तोर क्यों अति आनंद उमगे अनुरागा चरण सरोज पखन ला भगवान के चरण से जो आनंद मिला केवट कहने लगा अब कछु नाथ न चाहे मोरे भगवान के बिना मिले यह शब्द नहीं निकल सकता कि अब मैं सुखी हो गया आज के बाद मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं जो चाहा वो मुझे मुझे मिल गया जो चाहा मिला

चार चाहे और खड़ी हो गए चार समस्याएं और खड़ी हो गए इसलिए सखी भगवान ही एक है जिनके मिलने से तृप्ति हो सकती है दूसरा कोई नहीं है यहां दूस चार दिन का शरीर है आज जवान है कल बूढ़ा हो जाएगा भरोसा एकमात्र श्री भगवान में चित्त भगवान में अभी परमानंद है अभी इसी क्षण आनंद है वो वो भाई भी कह रहे थे कि सब कुछ बस मैं खुशी चाहता हूं तो खुशी किससे मिल जाएगी घर मिल जाए गाड़ी मिल जाए यह सब किसी के पास है वो खुश नहीं है जो तुम सोच रहे हो व किसी के पास है इस सृष्टि में ए भाई महाराज ययाति का नाम सुना है शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी जो देवता भी मोहित हो जाए इतनी सुंदरी थी वृष परवा की पुत्री शर्मिष्ठा जो दैत्य राज ब्र परवा दो पत्नियां और जब भोग से ति नहीं हुई तो अपने पुत्र की 1000 वर्ष की जवानी लेकर भोगा फिर इसके बाद घण घृणा आई कि धिक्कार मुझे अपने पुत्र की जवानी भोग डाली फिर भी कोई सुख नहीं वही भोग वासना त उन्होंने लिखा एक पुरुष को जो भगवान से विमुख है सृष्टि के सारे सुख मिल जाए तो भी वह तृप्त नहीं हो सकता

इसका मतलब है कि हम जैसे भी है अगर भगवान से जुड़कर संतोष कर ले तो आज सुखी है आज आनंद है अगर भगवान से ना जुड़े तो आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती सुख नहीं हो सकता तृप्ति नहीं हो सकती जी

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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